'चर्च में तलाक नहीं ले पायेंगे ईसाई पति-पत्नी'

नई दिल्ली (20 जनवरी): सर्वोच्च न्यायालय ने  उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पादरियों की अदालत द्वारा कैथलिक दंपतियों के तलाक को मान्यता प्रदान करने की मांग की गई थी। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह केहर तथा न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ ने बेंगलुरु के क्लारेंस पेस द्वारा दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में उन्होंने न्यायालय से गिरिजाघर के पादरियों की अदालत द्वारा तलाक की मंजूरी को मान्यता देने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि न्यायालय को शरिया कानून के तहत तीन तलाक की तरह इसे भी मान्यता देनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अगर पादरियों की अदालत द्वारा तलाक के लिए जारी आदेश को व्यवहार न्यायालय मान्यता प्रदान नहीं करते हैं, तो पादरियों की अदालत से तलाक लेकर दोबारा शादी करने वाले इसाईयों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत दो शादियां करने को लेकर सजा भुगतनी पड़ेगी। क्रिश्चियन पर्सनल लॉ के तहत कैथलिक इसाईयों को कैथलिक चर्च में ही शादी करना जरूरी है और तलाक भी कैथलिक अदालत ही देगी। किसी अन्य प्राधिकार द्वारा शादी और तलाक को कैथलिक पर्सनल लॉ मान्यता प्रदान नहीं करता है। पेस ने न्यायालय से भारत में कैनन लॉ (ईसाई धर्म कानून) को ईसाईयों के पर्सनल लॉ के रूप में मान्यता देने की मांग की थी।