INSIDE STORY: #SocialMedia पर #BoycottChineseProducts का हो रहा असर, #MadeInChina की मांग में 30% की कमी!

डॉ. संदीप कोहली,

नई दिल्ली (17 अक्टूबर): देश में चीनी सामान के बायकॉट की अपील का असर दिखने लगा है। सोशल मीडिया पर #BoycottChineseProducts लिखकर पिछले 15 दिनों से यह मुहीम चलाई जा रही है। जानी-मानी हस्तियों, राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ता जनता से चीनी सामान के बायकॉट की अपील कर रहे हैं। हमने भी 3 अक्टूबर को अपने आर्टिकल में बताया था कैसे देशभर में चीनी सामान को बैन करने के लिए सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाया जा रहा है। यही कारण है कि त्योहारी सीजन के बावजूद चीनी प्रोडक्ट्स की मांग में 30 फीसदी गिरावट की संभावना है। अखिल भारतीय व्यापारियों के परिसंघ (कैट) ने विभिन्न राज्यों से मिली बाजार रिपोर्ट के आधार पर इस बात का खुलासा किया है।

क्यों हो रहा है चीनी सामान का बायकॉट- उरी हमले के बाद से ही देशभर में पाकिस्‍तान के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्‍सा है। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कई कदम उठाए हैं। लेकिन चीन पाकिस्तान की नापाक हरकतों में लगातार उसका साथ दे रहा है। चीन ने पाकिस्तान की शह पर तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का पानी रोका। यूएन में अपने वीटो पावर का उपयोग करके जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने का विरोध किया है। भारत के एनएसजी सदस्यता के प्रयास में वह रोड़ा बना। यह भारत के खिलाफ पाक की 'चीनी साजिश' है। 

कारोबारियों को किस बात का है डर- कारोबारियों के अनुसार अगर चीनी सामान की खरीदारी में गिरावट आती है तो उसका नुकसान चीन के बजाय भारत को होगा। क्योंकि कारोबारियों ने दिवाली से दो-तीन महीने पहले ही चीन से अरबों का सामान (खिलौने, मूर्तियां, फर्नीचर, लाइटिंग इलेक्ट्रिक फीटिंग के सामान और गिफ्ट) मंगा लिया हैं और चीनी कारोबारियों को इसकी पेमेंट भी कर दी है। ऐसे में नुकसान कारोबारियों को ही होगा। 

योग गुरू बाबा रामदेव की अपील चीनी सामान का बहिष्कार करें- बाबा रामदेव ने भारतीयों से चीन के सामानों का इस्तेमाल बंद करने की अपील की है। रामदेव का कहना है कि चीन के सामानों की खरीद बंद करके ही चीन पर नियंत्रण किया जा सकता है। चीन के सामान को खरीदना देश के दुश्मन की मदद करने जैसा है। चीन की वस्तुओं का पूरे देश को बहिष्कार करना चाहिए क्योंकि जिस तरह से चीन हरकतें कर रहा है उससे राष्ट्र की एकता अखंडता और संप्रभुता को खतरा है।

कैसे आपके बेडरूम से बाथरूम तक पहुंचा 'Made in China' पहुंच गया है... - 1993 में चीन ने मुद्रा अवमूल्यन किया जिस कारण दूसरे देशों को उत्पाद सस्ते में मिलने लगे। - बाद में चीन ने अपनी करेंसी को मजबूत तो किया लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब भी कम है। - चीन अब इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक ही सीमित नहीं था,बाथरूम से बेडरूम तक प्रोडक्ट बनाने लगा। - दीवाली, होली, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहारों पर Made in China सामान की मार्केट भर गए। - देश के सबसे बड़े होलसेल मार्केट सदर बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ सी आ गई । - डेढ़ दशक पहले तक इस बाजार में चीनी सामान की हिस्सेदारी 30% थी, जो आज 60-70% है। - खिलौने, साइकिल, टीवी, कैलकुलेटर, घड़ियां, पंखे, ताले, बैटरियां, साइकिल, ऑटो पार्ट से लेकर। - देवी-देवताओं की प्रतिमाओं, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भारत मार्केट में उपलब्ध हैं। - ‘यूज एंड थ्रो’ की जो संस्कृति चीन में रही, वही आदात चीन ने भारत की जनता को लगा दी। - इसकी मार कमजोर देसी उत्पादकों पर पड़ी घड़ी, खिलौना, साइकिल उद्योग बर्बादी के कगार पर आ गए। 

भारतीय उद्योग को लगाई चीनी कंपनियों ने चपत... - ब्रांड कंपनियों का 25000 में मिलने वाला मोबाईल चीनी ब्रांड में मात्र 10000 में मिल जाता है।  - इतना ही नहीं, खिलौने, मूर्तियां, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक जैसे उत्पाद काफी सस्ते में उपलब्ध हैं।  - होली के मौके पर चीनी रंगों, पिचकारी और स्प्रिंकल्स की भी भारत में भरमार रहती है। - भारतीय रंग की तुलना में चीनी रंग और पिचकारी 60 फीसद तक सस्ते रहते हैं।  - भारत के रंगों से जुड़े 75 फीसद कारोबार पर चीन ने कब्जा कर लिया है। - चीनी पटाखों के कारण शिवकाशी का पटाखा उद्योग बर्बादी के कगार पर आ चुका है - देश में पटाखों का कारोबार करीब 6,000 करोड़ रुपये का है।  - जिसमें से अकेले चीनी पटाखों ने करीब 1000 करोड़ रुपये पर कब्जा कर लिया है। - सेंट्रल एक्साइज के मुताबिक सॉफ्टवेयर और म्यूजिक में पायरेटेड चीन माल धड़ल्ले से बिक रहा हैं।  - फिल्मों में 6500 करोड़ रूपए का तो किताबों में 319 करोड़ का नकली कारोबार है। - ऑटो सेक्टर में 8300 करोड़ रूपए का तो सॉफ्टवेयर में 2 लाख करोड़ का नकली माल बिक रहा है। - पिछले साल online के जरिये बेचे गए 40% चीनी प्रोडेक्ट की गुणवत्ता घटिया और नकली थी। - चीन ने ऐसे कई बाजार बनाए हैं जहां पर कोई भी इंपोर्टर जाए और नमूना देखकर ऑर्डर दे सके।  - वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम competitiveness रैंकिंग में दुनिया में चीन 25 और भारत 55वें नंबर पर है।

चीनी बाजार में भारत की पहुंच आसान नहीं... - भारत भी चीनी मार्केट में लगातार अपने फार्मास्युटिकल, कृषि और आईटी सेवाओं की आसान पहुंच की मांग करता रहा है।  - लेकिन भारत के लिए दवा, आईटी और एग्री कमोडिटीज के चीन को निर्यात में सबसे बड़ी बाधा नॉन टैरिफ बैरियर रही है।  - CII के अनुसार चीन ने अपने यहां ऐसे नियम बना रखे हैं कि भारतीय कम्पनियों या तो वहां मिलने वाले ठेकों के लिए योग्य ही नहीं मानी जाती।  - चीन के कुछ राज्यों में स्थानीय कंपनियों को सब्सिडी दी जाती है जिससे भारतीय कम्पनियां लागत ज्यादा होने से प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं।  - भारत ने डब्ल्यूटीओ में चीन के खिलाफ भारतीय मीट के आयात पर प्रतिबंध के फैसले पर भी सवाल खड़े किए थे।  - भारत चीन को 40 प्रतिशत लौह-अयस्क निर्यात करता है, अन्य निर्यात वस्तुओं में प्लास्टिक के उत्पाद, इस्पात, रसायन, सोयाबिन तेल हैं।  - चीन में कच्‍चे माल पर सब्सिडी दी जाती है, इसलिए चीनी बाजार भारत से ताबड़तोड कच्‍चा माल खरीदता है।  - चीन ने यीवू शहर में दुनिया का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट बनाया।  - यूएन और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाएं भी इसे स्मॉल कमोडिटी का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट मान चुकी हैं।  - यहां सात लाख से ज्यादा दुकानें हैं, दुनियाभर के इंपोर्टर यहां आते हैं और अपने सामान का ऑर्डर देते हैं।  - चीन ने ऐसे कई बाजार बनाए हैं जहां पर कोई भी इंपोर्टर जाए और नमूना देखकर ऑर्डर दे सके।  - वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम competitiveness रैंकिंग में दुनिया में चीन 25 और भारत 55वें नंबर पर है। 

चीन से बिगड़े रिश्ते तो दवाओं पर होगा असर... - भारत की फार्मा इंडस्ट्री कच्चे माल के लिए बहुत हद तक चीन पर निर्भर है।  - दवा निर्माण के लिए भारत 85 फीसदी एपीआई का आयात चीन से ही करता है।  - एपीआई यानी एक्टिव फार्मासूटिकल इन्ग्रीडियेंट, जो चीन में ही बनाया जाता है। - यदि चीन के साथ कूटनीतिक संबंध खराब हुए तो दवाओं की कमी हो सकती है।  - वास्तव में ऐसे किसी संकट का असर दूसरे देशों पर भी पड़ेगा।  - दुनिया के कई देशों में भारत सस्ती जिनेरिक दवाओं को निर्यात करता है।  - भारत में बहुत से एपीआई उत्पादकों ने अपना कारोबार बंद कर दिया - एपीआई उत्पादकों का कहना है कि चीन का प्रॉडक्ट काफी सस्ता है।  - भारत में एक लाख करोड़ से अधिक के फार्मासूटिकल इंडस्ट्री है - जिसमें एपीआई की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है। 

भारत-चीन में कितना है व्यापार... - भारत-चीन की अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की बड़ी अर्थव्यस्थाओं में गिनी जाती है। - दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते की शुरुआत साल 1978 में हुई थी। - ASSOCHAM के मुताबिक 2001 और 2014 के बीच चीन से आयात लगभग दोगुना हुआ। - इस बीच भारत में चीनी सामानों का आयात रिकॉर्ड 34 गुना तक बढ़ चुका है। - चीन से वस्तुओं का आयात भारत के कुल आयात के 13 फीसदी से ज्यादा है। - भारत और चीन के बीच अगर व्यापार की बात करें, तो ये 2003-2004 में 7 अरब डॉलर था। - जो 2014-15 में बढ़कर लगभग 70 अरब डॉलर यानी 4.70 लाख करोड़ का हो गया है। - जिसमें से भारत चीन को सिर्फ 79 हजार करोड़ रुपए का निर्यात करता है। - जबकि 3.87 लाख करोड़ का भारत चीन से आयात करता है, यानी व्यापार घाटा 3 लाख करोड़ है।

चीन से हम निर्यात से ज्यादा आयात करते हैं... - भारत के कुल आयात का छठा हिस्सा चीन से आता है  - जो साल 2011-12 के दौरान महज 10वां हिस्सा था।  - इसी दौरान भारत से चीन को होने वाला निर्यात घटकर आधा हो चुका है।  - पिछले दो सालों में चीन से आयात में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है  - जबकि पिछले पांच सालों में यह पांच फीसदी बढ़कर 61 अरब डॉलर का हो चुका है।  - इसमें पॉवर प्लांट से लेकर सेट टॉप बॉक्स और गणेश की मूर्तियां जैसी कई चीजें शामिल हैं।  - भारत से चीन को होने वाला निर्यात 2015-15 में घटकर 9 अरब डॉलर रह गया है।  - कपास, कॉपर, पेट्रोलियम और इंडस्ट्रियल मशीनरी का निर्यात किया जाता है।  - जितना हम निर्यात करते हैं उससे छह गुना ज्यादा खरीदते हैं। 

चीन से आयात-  चीन से भारत आने वाले सामानों में मुख्यत: मोबाइल फोन, लैपटॉप, सोलर सेल, उर्वरक, कीबोर्ड, डिस्प्ले, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट, इयरफोन आदि शामिल हैं।  इसके अलावा चीन से तपेदिक और कुष्ठ रोग की दवाएं, एंटीबायोटिक दवाएं, बच्चों के खिलौने, इंडस्ट्रियल स्प्रिंग, बॉल बेयरिंग, एलसीडी और एलईडी डिस्प्ले, राउटर, टीवी रिमोट और सेट टॉप वाक्स का आयात किया जाता है। 

भारतीय बाजार में चीनी स्मार्टफोन ब्रांड्स- घरेलू बाजार में चीन के स्मार्टफोन ब्रांड की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है। लेनोवो, हुवेई, श्याओमी, जेडटीई, वीवो और जियोनी जैसे चीनी ब्रांड इंटेक्स, एप्पल, माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा, सैमसंग और एलजी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। चीन की कंपनियों ने ऑनलाइन माध्यमों का कारगर ढंग से इस्तेमाल कर अपनी प्रचार-प्रसार नीति अपनाई है। चीनी स्मार्टफोन को भारत में मिल रही इस कामयाबी से उत्साहित वहां की करीब 45 छोटी-बड़ी कंपनियां भारतीय बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही हैं।