OBOR प्रॉजेक्ट से ASIA के देशों को कंगाल कर ऐसे फंसाएगा चीन


नई दिल्ली (25 मई): चीन के OBOR प्रॉजेक्ट को भारत का समर्थन हासिल नहीं है। अब इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र इकनॉमिक ऐंड सोशल कमिशन फॉर एशिया ऐंड पैसिफिक (UNESCAP) की हाल की एक स्टडी में दक्षिण और मध्य एशिया के उन देशों के कर्ज में फंसने की चेतावनी दी गई है, जिनमें चीन की ओर से घोषित इनवेस्टमेंट की वैल्यू संबंधित देश की अर्थव्यवस्था के साइज की तुलना में अधिक है।


संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि 2015 में चीन और उज्बेकिस्तान के बीच साइन की गई 15 अरब डॉलर की इनवेस्टमेंट डील उज्बेकिस्तान के जीडीपी के लगभग एक-चौथाई के बराबर है। इसी तरह 2014 के अंत और 2015 की शुरुआत में कजाकिस्तान के साथ हुए चीन के को-ऑपरेशन अग्रीमेंट्स और अप्रैल 2015 में चीन-पाकिस्तान के बीच 46 अरब डॉलर का अग्रीमेंट कजाकिस्तान और पाकिस्तान के जीडीपी के 20 पर्सेंट से अधिक का है। पाकिस्तान में अब चीन का इनवेस्टमेंट 62 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। स्टडी में कहा गया है कि अक्टूबर 2016 में चीन और बांग्लादेश के बीच हुआ अग्रीमेंट बांग्लादेश के जीडीपी के लगभग 20 पर्सेंट के बराबर है।


स्टडी के मुताबिक, 'इनमें से कुछ देशों के एक्सटर्नल अकाउंट इंडिकेटर्स कमजोर हैं। कजाकिस्तान का करंट अकाउंट डेफिसिट 2016 में उसके जीडीपी का लगभग 6 पर्सेंट था, जबकि उसका एक्सटर्नल डेट जीडीपी के 80 पर्सेंट से ऊपर है। पाकिस्तान में फॉरन एक्सचेंज रिजर्व की स्थिति खराब है और उसके पास 2017 की शुरुआत में केवल चार महीने के इम्पोर्ट के लिए ही फॉरन करेंसी रिजर्व था।'


चीन की फंडिंग वाले प्रॉजेक्ट्स के कारण श्रीलंका कर्ज के भारी बोझ का सामना कर रहा है। श्रीलंका का कुल कर्ज 60 अरब डॉलर से अधिक का है और उसे इसमें से 10 पर्सेंट से अधिक चीन को चुकाना है। श्रीलंका सरकार ने कर्ज के संकट से निपटने के लिए अपने डेट को इक्विटी में तब्दील करने पर सहमति दी है। इससे श्रीलंका में मौजूद प्रोजेक्ट्स पर चीन का मालिकाना हक बनने की स्थिति आ सकती है। OBOR से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े स्तर पर इनवेस्टमेंट की जरूरत होगी। चीन सरकार का अनुमान है कि उसका इनवेस्टमेंट लगभग 4 लाख करोड़ डॉलर का होगा।


इसके अलावा OBOR प्रॉजेक्ट के कारण पर्यावरण से जुड़े और सामाजिक जोखिम भी पैदा हो सकते हैं। स्टडी में कहा गया है कि इस प्रॉजेक्ट के तहत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स के कंस्ट्रक्शन के लिए लैंड यूज में बदलाव करने होंगे। इन परियोजनाओं से पानी और हवा की क्वॉलिटी भी खराब होगी।