ऐसे 184 रुपए के अंतर से चीन को भूखा मार सकता है भारत

नई दिल्ली (30 अगस्त): जब भी भारत और चीन के रिश्तों में तनाव की बात आती है, तभी यह कहा जाता है कि अगर हम चीन का सामान खरीदना बंद कर दें तो वह भूखा मर जाएगा, लेकिन अगर आने वाले दिनों में भारत अपनी मैन्युफैक्चरिंग इंड्रस्ट्री को बढ़ावा देता है तो वह ड्रैगन को मात दे सकता है।

दरअसल चीन अपने मजदूरों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा मजदूरी देता है। ऐसे में आउटपुट कॉस्ट बढ़ जाता है और सामान अपेक्षाकृत महंगे हो जाते हैं। एक मार्केट रिसर्च फर्म यूरोमॉनिटर के मुताबिक पिछले साल चीन में घंटे के हिसाब से औसत मजदूरी 3.60 डॉलर/घंटे (करीब 230 रुपये) थी। 2011 की तुलना में यह 64 फीसदी अधिक थी। भारत में घंटे के हिसाब से औसत मजदूरी चीन की तुलना में 5 गुना कम है। यह अंतर करीब 184 रुपये का पड़ता है।

पिछले दशकों में चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है, ऐसे में मजदूरी भी बढ़ी है। चीनी कंपनियों के पास अपनी लागत घटाने के लिए ऑटोमेशन एक उपाय है, लेकिन इससे भी अंतत: बेरोजगारी ही बढ़ेगी। ऐसे में चीनी मैन्युफ़ैक्चरर्स को अपना काम ऐसे छोटे देशों में शिफ्ट करना पड़ सकता है, जहां मजदूरी की दर अपेक्षाकृत कम है। हालांकि अगर भारत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अपने आप को खड़ा कर लेता है तो यह चीन के लिए काफी परेशानी का सबब बन सकता है। भारत अभी निर्यातोन्मुखी उद्योगों को विकसित करने की प्रारंभिक अवस्था में है, लेकिन उसके पास श्रम प्रधान उद्योगों के एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में उभरने की प्रबल संभावना है।