साउथ चाइना सी में अंडर-वॉटर प्लेटफॉर्म बनाएगा चीन

नई दिल्ली(28 फरवरी): चीन दक्षिणी चीन सागर क्षेत्र में लगातार अपनी सक्रियता और उपस्थिति बढ़ा रहा है। इसे लेकर जहां अंतरराष्ट्रीय कोर्ट चीन के खिलाफ फैसला दे चुकी है और कई अहम देश उसके खिलाफ लामबंद हो रहे हैं, वहीं चीन ने यहां पानी के नीचे अपना पहला दीर्घकालिक प्लेटफॉर्म बनाने का फैसला किया है। साउथ चाइन सी को प्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफी संपन्न माना जाता है। इस क्षेत्र पर अधिकार को लेकर चीन का मलयेशिया, फिलीपीन्‍स और वियतनाम के साथ विवाद है। यहां अंडर-वॉटर प्लेटफॉर्म का निर्माण कराए जाने के पीछे चीन का मकसद पानी के नीचे की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना है। जैसे-जैसे दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन पर दबाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वह और आक्रामक होता जा रहा है।

चाइनीज अकैडमी ऑफ साइंसेज (CAS) के एक वैज्ञानिक वांग पिनजियान ने बताया, 'शंघाई के तोंगजी यूनिवर्सिटी और इंस्टिट्यूट ऑफ अकूस्टिक्स की मदद से दक्षिणी चीन सागर और पूर्वी चीन सागर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दीर्घकालिक निरीक्षण प्लेटफॉम का निर्माण कराया जाएगा।' चीन द्वारा समुद्र के अंदर की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस तरह बड़े स्तर पर प्लेटफॉर्म बनाने का कदम काफी अहम है। इंस्टिट्यूट ऑफ अकूस्टिक्स ने इस प्लेटफॉर्म की लोकेशन और इससे जुड़ी कोई भी अन्य जानकारी देने से इनकार कर दिया। पिनजियान ने शंघाई में बताया कि इस प्रॉजेक्ट की संवेदनशीलता को देखते हुए यह एहतियात बरता जा रहा है।

दुनिया के कुल समुद्रीय यातायात का करीब एक तिहाई हिस्सा इस रास्ते से होकर गुजरता है। यहां कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बहुत बड़ा भंडार भी है। चीन इसके तकरीबन पूरे हिस्से पर अपना अधिकार बताता है। फिलीपीन्‍स, वियतनाम, मलयेशिया, ब्रूनेई और ताइवान भी इसपर अपना अधिकार बताते हैं। पूर्वी चीन सागर में जापान का जिन द्वीपों पर नियंत्रण है, उनपर भी चीन अपना दावा करता है। खबरों के मुताबिक, इस अंडर-वॉटर प्लेटफॉर्म की मदद से चीन समुद्र में होने वाली सभी गतिविधियों पर तो नजर रखेगा ही, साथ ही इसे कई अन्य तरीकों से भी इस्तेमाल करेगा।

चीन के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में यहां समुद्रतट से दूर एक ड्रिलिंग प्रॉजेक्ट के लिए 7 फरवरी को अमेरिका, फ्रांस, इटली और जापान सहित 13 देशों के 33 वैज्ञानिक हॉन्ग कॉन्ग स्थित विक्टोरिया बंदरगाह से दक्षिणी चीन सागर के लिए निकले। वैज्ञानिकों ने इस ड्रिलिंग प्रोग्रैम का पहला चरण पूरा कर लिया है। U1499A नाम के इस पहले छेद की गहराई समुद्र की तलहटी से 3,770 मीटर नीचे पहुंच गई है। यहां से तलछट और गाद के नमूने जमा किए जा रहे हैं। शुरुआती जांच के मुताबिक, इस तलछट का निर्माण करीब 80 साल पहले हुआ था। पहले छेद के पास ही दूसरा ड्रिलिंग कार्य भी शुरू हो चुका है। इसके द्वारा तलछट के मुख्य हिस्से के बारे में जानकारी जुटाए जाने की उम्मीद है।

वैज्ञानिक इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि जब महाद्वीप एक-दूसरे से अलग हुए थे, तब यहां के लिथोस्फियर (स्थलमंडल) का कितना विस्तार हुआ। इसके लिए दक्षिणी चीन सागर के सुदूर उत्तरी क्षेत्र में 3,000 से 4,000 मीटर की गहराई में चार जगहों पर ड्रिलिंग की जाएगी। इस ड्रिलिंग अभियान में 13 देशों के कुल 66 वैज्ञानिक भाग लेंगे। यह अभियान अंतरराष्ट्रीय महासागरीय खोज कार्यक्रम का हिस्सा है।