छठ: खरना आज, जानें इसकी विधि और महत्व

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (12 नवंबर): छठ का महापर्व शुरू हो चुका है। यह पर्व 11 नवंबर से नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ। आज खरना है। कल यानी 13 नवंबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जबकि परसों यानी 14 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इस माहापर्व की समाप्ति हो जाएगी। चार दिनों तक यह पर्व चलता है। सूर्य उपासना का यह महापर्व सूर्य को प्रसन्न करके संतान की मनोकामना तथा कुशलता के लिए मनायी जाती है। छठ देवी सूर्य की बहन हैं लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं। देवी कहती हैं कि यदि तुम योग्य संतान चाहते हो तो मेरी विधिवत पूजा करो।

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आज छठ पूजा का दूसरा दिन यानी खरना है। खरना का छठ पूजा में खास महत्व होता है। खरना का मतलब शुद्धिकरण से है। व्रती नहाय खाय के दिन एक समय भोजन करके अपने शरीर और मन को शुद्ध करना आरंभ करते हैं जिसकी पूर्णता अगले दिन होती है इसलिए इसे खरना कहते हैं। इस दिन व्रती शुद्ध अंतःकरण से कुलदेवता और सूर्य एवं छठ मैय्या की पूजा करके गुड़ से बनी खीर का नैवेद्य अर्पित करते हैं। देवता को चढ़ाए जाने वाले खीर को व्रती स्वयं अपने हाथों से पकते हैं। इसके लिए मिट्टी के नए चूल्हे का प्रयोग किया जाता है। खीर पकाने के लिए शुद्ध अरवा चावल या साठी के चावल का प्रयोग होता है। इंधन के रूप में सिर्फ लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है। आम की लकड़ी का प्रयोग करना उत्तम माना गया है।

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खरना पूजन के बाद व्रती पहले स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं और इसके बाद परिवार के लोग। खरना पूजन में एक बार भोजन कर लेने के बाद व्रती को कुछ भी खाना-पीना नहीं होता है। संध्या अर्घ्य और सुबह का अर्घ्य देने के बाद ही व्रती व्रत का परायण कर सकते हैं। खरना के बाद व्रती दो दिनों तक साधना में होते हैं जिसमें उन्हें पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भूमि पर शयन करना होता है। इसके लिए सोने के स्थान को अच्छे से साफ सुथरा करके पवित्र किया जाता है और स्वच्छ बिस्तर बिछाया जाता है।