आस्था का महापर्व है छठ, जानें इससे जुड़ी प्रचलित कहानियां

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (12 नवंबर): बिहार,उत्तर प्रदेश और झांडखंड समेत देश के कई हिस्सों में छठ पूजा की तैयारी जोरों पर है। आज जहां नहाय खाय है वहीं कल खरना है। परसों यानी 13 नवंबर को डुबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा वह 14 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इस माहपर्व का समापन होगा। 13 नवंबर 2018, मंगलवार के दिन षष्ठी तिथि का आरंभ 01:50 मिनट पर होगा जिसका समापन 14 नवंबर 2018, बुधवार के दिन 04:21 मिनट पर होगा।

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मान्यता के मुताबिक छठ पूजा के दौरान अगर भक्त सच्चे मन भगवान भास्कर की अराधन करने से हर मुराद पूरी होती है। मान्यता के मुताबिक कहा जाता है कि छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन है। छठ देवी को प्रसन्न करने के लिए भक्त भगवान सूर्य की आराधना करते हैं और उनका धन्यवाद करते हुए गंगा-यमुना या फिर किसी नदी या सरोबर के किनारे इस पूजा अर्चना करते हैं। सद्भावना और उपासना के इस महापर्व के बारे में कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित है। 

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छठ पूजा से जुड़ी 4 प्रचलित कहानियां...

1- भगवान राम ने रावण की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीते को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।


2- छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। मान्याताओं के अनुसार वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्‍य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।


3- इसके अलावा महाभारत काल में छठ पूजा का एक और वर्णन मिलता है। जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाठ हार गए तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। 


4- छठ पूजा के संबंध में राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कहना भी प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। हर्षि कश्यप की सलाह ने दंपति ने यज्ञ करवाया लेकिन दुर्भाग्य में उनके घर मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ। इससे परेशान राजा-रानी ने प्राण त्यागने की कोशिश करने लगे। उसी समय भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी वजह से वो षष्ठी कहलातीं हैं। उनकी पूजा करने से उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। और तभी से छठ पूजा हो रही है।