'नौकरी के मामले में विवाहित महिलाओं ने अविवाहितों से मारी बाजी'

नई दिल्ली(19 दिसंबर): भारतीय महिलाओं के बारे में आमतौर पर ये धारणा होती है कि उनकी हद रसोई तक ही सीमित होती है। लेकिन जनगणना 2011 की रिपोर्ट में कई रोचक जानकारियां सामने आई हैं। रिपोर्ट में महिलाओं की रूचि, समाज में हैसियत और नौकरी के बारे में विस्तार से बताया गया है।

जनगणना 2011 की खास बातें

- रिपोर्ट के मुताबिक नौकरी के मामले में महिलाओं में ही ज्यादा अंतर है। 41 फीसद विवाहित महिलाएं जहां नौकरीपेशा हैं। वहीं ये आंकडा़ अविवाहित औरतों में सिर्फ 27 फीसद है। नौकरीपेशा विवाहित महिलाएं आमतौर पर कम बच्चे चाहती हैं। इसके अलावा बच्चे के रूप उनकी हसरत बेटे की होती है, जो पितृसत्ता की तरफ इशारा करती है।

- 15-49 उम्र समूह में कामकाजी महिलाएं चाहे वो घरेलू कामों में जुड़ी हुई हों या नौकरी करती हों, बेटों की प्रति चाहत चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक विवाहित महिलाओं की इस सोच की वजह से लिंगानुपात में कमी दर्ज की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं की बेटों के प्रति सोच में पारंपरिक सोच ही रखती हैं।

- 15-49 उम्र समूह में 27 फीसद अविवाहित औरतें नाैकरीपेशा हैं। जानकारों का कहना है कि ज्यादातर अविवाहित लड़कियों को उनका परिवार नौकरी करने की इजाजत नहीं देता है। कुछ लड़कियां कॉलेज में पढ़ रही होती हैं। जानकारों का कहना है कि सामान्य तौर पर भारतीय मानसिकता होती है कि अविवाहित महिलाओं को घरों की दहलीज नहीं पार करना चाहिए

- 15-49 उम्र समूह में एक दशक पहले कामकाजी विवाहित महिलाओं को 3.1 बच्चे हुआ करते थे। लेकिन अब ये आंकड़ा घटकर 2.9 हो गया है। जबकि नौकरी नहीं करने वाली विवाहित महिलाओं में ये आंकड़ा 3.1 है जो 2001 में 3.2 था। विवाहित और अविवाहित महिलाओं के संबंध में लिंगानुपात में कमी आई है। लेकिन ये कमी विवाहित महिलाओं में ज्यादा है। विवाहित महिलाओं में ये आंकड़ा 912 से घटकर 901 है। जबकि अविवाहित महिलाओं में ये आंकड़ा 901 से घटकर 894 हो गया है। ग्रामीण बनाम शहरी भारत रिपोर्ट की चौंकाने वाली बात ये है कि नौकरी पेशा के संबंध में ग्रामीण और शहरी भारत में फर्क है। ग्रामीण इलाकों में करीब 22 फीसद महिलाएं नौकरीपेशा हैं। शहरी इलाकों में कामकाजी महिलाओं की प्रजनन दर में कमी आई है। शहर में कामकाजी महिलाओं को औसतन दो बच्चे हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़ा 3.1 है।