जानिए, मिशन 'उत्तर प्रदेश' के लिए 'ब्राह्मण' समीकरण पर क्या है पार्टियों का दांव

अशोक तिवारी, रमन कुमार, नई दिल्ली (18 जून): यूपी के महाभारत में सभी राजनीतिक पार्टियों की नजर ब्राह्मण वोटरों पर है। यूपी में ब्राह्मण वोटर किसी का भी खेल बनाने और बिगाड़ने की कुव्वत रखते हैं । कांग्रेस, बीजेपी, बीएसपी, समाजवादी पार्टी सबकी नजर ब्राह्मण वोटरों पर है । इसीलिए, हर राजनीतिक पार्टी अपनी रणनीति ब्राह्मण वोटरों को ध्यान में रखते हुए बना रही है। सबसे पहले बात कांग्रेस की। 

कांग्रेस

कांग्रेस को यूपी में एक ऐसे चेहरे की तलाश है, जो पार्टी को विधानसभा चुनाव में जीत दिला सके। जो सूबे के जातीय समीकरण में बिल्कुल फिट बैठे। लखनऊ में पार्टी नेताओं से राय-मशवरा कर दिल्ली पहुंचे यूपी के कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने सोनिया और राहुल गांधी से मुलाकात की। बंद कमरे में क्या बात हुई, पता नहीं, लेकिन, यूपी कांग्रेस में बदलाव की तैयारी है।

कांग्रेस यूपी में कांग्रेस ब्राह्मण चेहरे पर दांव लगाना चाहती है। सूबे में ब्राह्मण वोटरों की तादाद करीब 10 फीसदी है। जो कभी कांग्रेस के साथ हुआ करते थे। फिलहाल, कांग्रेस में पांच ब्राह्मण चेहरों पर हिसाब लगाया जा रहा है। 65 साल के प्रमोद तिवारी खांटी कांग्रेसी हैं। 

यूपी की राजनीति में अच्छी पकड़ रखते हैं। एक ही विधानसभा क्षेत्र ने 9 बार लगातार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं और गांधी परिवार के करीबी भी। प्रमोद तिवारी के दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी करीबी रिश्ते हैं। ऐसे में अगर पार्टी प्रमोद तिवारी का नाम आगे करती है तो चुनावी नतीजों के बाद गठबंधन में पार्टी को बढ़त मिल सकती है। 

जितिन प्रसाद युवा हैं। मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। दिल्ली की राजनीति से इनका नाता ज्यादा है। लेकिन, राहुल गांधी के करीबी हैं। इनके पिता जितेंद्र प्रसाद की यूपी के ब्राह्मण वोटरों पर तगड़ी पकड़ हुआ करती थी। जितेंद्र प्रसाद की मौत के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को जितिन आगे बढ़ा रहे हैं। सूबे की राजनीति में प्रमोद तिवारी के मुकाबले इनका वजह थोड़ा हल्का है ।

कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने शीला दीक्षित को यूपी में चेहरा बनाने की मांग की थी। शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वैसे तो शीला पंजाबी हैं, जो कपूरथला में पैदा हुईं। उनकी शादी यूपी के ब्राहमण नेता उमाशंकर दीक्षित के बेटे से हुई थी। इस लिहाज से शीला यूपी की बहू हैं। वो कन्नौज से सांसद भी रह चुकी हैं। उनके सोनिया गांधी से करीबी रिश्ते हैं और राहुल भी उनकी बहुत इज्जत करते हैं। 

लेकिन, अब शीला की पहचान दिल्ली के नेता के रूप में बन गय़ी है। इतना ही नहीं दिल्ली टैंकर घोटाले की आंच भी शीला तक पहुंच रही है। सूत्रों के मुताबिक, शीला खुद दिल्ली से बाहर नहीं जाना चाहती हैं। यूपी कांग्रेस में राजेश पति त्रिपाठी भी एक बड़ा चेहरा हैं। वाराणसी और उससे आप-पास के इलाकों के ब्राह्मणों पर इनका अच्छा प्रभाव है। ये कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे कमलापति त्रिपाठी के पोते हैं। 

राजेश मिश्रा भी वाराणसी से ताल्लुक रखते हैं और इलाके के ब्राह्मण वोटरों पर इनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। कांग्रेस किसी कीमत पर अपने पुराने वोट बैंक यानी ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले से खिसकने नहीं देना चाहती ।

दरअसल, यूपी में कांग्रेस अपने किसी भी चेहरे ने नाम पर मुहर लगाने से पहले बीजेपी के चेहरे और दांव को देख लेना चाहती है। यूपी की सत्ता से कांग्रेस पिछले 27 साल से आउट है। अब यूपी की सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस ब्राह्मण वोटरों की ओर देख रही है, जिनका आशीर्वाद कभी कांग्रेस मिला करता था। जानकारों का मानना है कि ब्राह्मण वोटरों के दम पर ही कांग्रेस ने यूपी पर 4 दशक तक राज किए कई ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनाए। संगठन से लेकर सरकार तक में ब्राह्मणों को अहम जिम्मेदारियां मिली। 

फिलहाल, यूपी में कांग्रेस की रणनीति अपने पारंपरागत वोट बैंक को साधने की है, जिसमें टॉप पर ब्राह्मण हैं। शायद, इसीलिए पार्टी की कोशिश प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर किसी ब्राह्मण चेहरे को बैठाने की है। जिससे ब्राह्मण वोटरों का भरोसा जीता जा सके। 

कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि ब्राह्मण वोटर ही उसे ताकत दे सकते हैं। एक जमाना था जब यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ब्राह्मण नारायण दत्त तिवारी थे, दलित नेता महावीर प्रसाद प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर और मोहसिना किदवई सूबे में मुस्लिम चेहरा। अब सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस अपना पूराना फॉर्मूला नए सांचे में फिट करने की कोशिश कर रही है। 

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)

 

बीजेपी की भी नजर यूपी के ब्राह्मण वोटरों पर है। उन्हें नाराज करने का खतरा पार्टी नहीं उठा सकती। बीजेपी ने ब्राह्मण लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हटाकर ओबीसी के केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया...ब्राह्मण बीजेपी से बिदक गए। अब, ब्राह्मणों को खुश करने के लिए नए समीकरण भिड़ाए जा रहे हैं। 

 

बीजेपी के लिए यूपी विधानसभा चुनाव चक्रव्यूह के पहले द्वार की तरह है, जिसके टूटने से ही मोदी के मिशन 2019 की राह आसान होगी। इलाहाबाद में पार्टी ने अपने एक-एक वोट का हिसाब किया । जातीय समीकरण को लेकर जमकर मंथन हुआ। बीजेपी सर्वणों को अपना वोटबैंक बताती है। 

यूपी में करीब 20 प्रतिशत सवर्ण वोटर हैं, जिसमें से 10 फीसदी ब्राह्मण है। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान ब्राह्मण लक्ष्मीकांत वाजपेयी प्रदेश अध्यक्ष थे। पार्टी को ब्राह्मणों का साथ मिला और 73 सीटों पर कमल खिल गया। लेकिन, पार्टी ने लक्ष्मीकांत को किनारे करते हुए ओबीसी केशव प्रसाद मौर्य को पाटी अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया। ब्राह्मण नाराज हो गए। 

ऐसे में बीजेपी ने सूबे के ब्राह्मणों को खुश करने के लिए शिवप्रताप शुक्ल को यूपी से राज्यसभा भेज दिया। लेकिन, पार्टी अभी भी उलझी हुई है कि चेहरा किसे बनाएं। आज की तारीख में बीजेपी में कई ब्राह्मण चेहरे हैं- जिन्हें पार्टी आगे कर सकती है। सूबे के बड़े ब्राह्मण वोट को अपने खाते में ट्रांसफर करवाने के लिए। 

बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी बड़ा नाम हैं। एक जमाने में नारा लगता था-बीजेपी की तीन धरोहर अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर। अब जोशी बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में बैठा दिए गए हैं। इलाहाबाद कार्यकारिणी के दौरान जोशी सक्रिय दिखे। ऐसे में अटकलों का बाजार गर्म है कि कहीं पार्टी जोशी को आगे तो नहीं कर रही। कलराज मिश्र का यूपी के ब्राह्मण वोटरों पर अच्छा खासा प्रभाव है। सूबे की राजनीति में अच्छी पकड़ भी। फिलहाल, कलराज मिश्र मोदी कैबिनेट में मंत्री है और अब उम्र 75 के करीब होनेवाली है। 

महेश शर्मा नोएडा से सांसद और मोदी सरकार में मंत्री हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समेत दूसरे संगठनों में भी उनके चाहनेवालों की लिस्ट लंबी है। दिखने में भी युवा हैं। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। महेश शर्मा की बोली हिंदूवादी संगठनों को पसंद आती है। किसी भी नाम पर आखिरी फैसला लेने से पहले बीजेपी एक-एक वोट का पूरा हिसाब लगाएगी। कमल पर बैठे महारथी अच्छी तरह जानती है कि वगैर ब्राह्मणों को साधे यूपी की राजनीतिक वैतरणी पार नहीं हो सकती। 

जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में बीजेपी का ब्राह्मण वोट बैंक सिकुडा है। साल 2002 में जहां बीजेपी को सूबे के ब्राह्मणों का 50 प्रतिशत वोट मिला। वहीं, 2012 में ये घटकर 38% रह गया। 

बहुजन समाजवादी पार्टी (बीएसपी)

मायावती दलित और ब्राह्मण गठजोड़ से यूपी की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। बीएसपी में अहम पदों पर ब्राह्मणों को बैठाया गया है। इतना ही नहीं हाल में ब्राह्मणों के खिलाफ सोशल पर टिप्पणी करनेवाले एक नेता को मायावती से पार्टी से निकाल दिया। सूबे में ब्राह्मण वोटरों का दम देखते हुए समाजवादी पार्टी ने भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ ली है। 

मायावती यूपी की सत्ता में दोबारा वापसी के लिए चुपचाप अपने वोटबैंक को मजबूत करने में लगी हैं। वो अच्छी तरह जानती है कि यूपी में सत्ता की असली चाबी ब्राह्मणों के हाथ में है। हाल में देवरिया के बीएसपी नेता संजय भारती ने ब्राहम्णों के बारे में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक बातें लिख दीं। जिससे मायावती के ब्राह्मण-दलित गठजोड़ को ठेस पहुंचने का खतरा हो गया। तो संजय भारती हाथी की पीठ से सीधे जमीन पर पटक दिए गए। 

2014 लोकसभा चुनाव में जब मायावती की पार्टी का सूपड़ा साफ हुआ, तभी से वो अपने वोट बैंक को खाद-पानी देने में लग गयी है। उन्होंने गरीब सवर्णों के आरक्षण का मुद्दा उठा दिया। मायावती ने ब्राह्मणों पर प्रयोग करते हुए इस बार फिर पार्टी के ब्राह्मण चेहरे सतीश मिश्र को राज्यसभा भेजा। मायावती को 2007 से ही ब्राह्मणों का साथ मिलता रहा है। तब उन्होंने 89 ब्राह्मणों समेत 139 सवर्णों को टिकट दिया था। मायावती अच्छी तरह जानती हैं कि सिर्फ दलित वोटों से यूपी का सिंहासन नहीं मिल सकता है। 

समाजवादी पार्टी (सपा)

सपा की भी पैनी नजर सूबे के ब्राह्मण वोटरों पर है। राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि कब कौन सा दांव खेलना है। मुलायम के भाई शिवपाल यादव ने कैराना में हिंदुओं के पलायन के मुद्दे की जांच के लिए साधु-संतों से अपील की। इसके लिए पांच नाम भी ले लिए।

समाजवादी पार्टी की ओर से ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने की पहले भी कई बार कोशिश हुई। समाजवादी पार्टी दावा करती रही है कि सूबे ब्राह्मणों की असली लड़ाई मुलायम ने लड़ी है। अखिलेश कैबिनेट में कई ब्राह्मण चेहरों को जगह मिली, लेकिन, दमदार रुतबा किसी का नहीं रहा। न ही हाल में साइकिल से कोई ब्राह्मण चेहरा राज्यसभा भेजा गया। फिलहाल, यूपी के राजनीतिक अखाड़े की सभी पार्टियां कोई ऐसा चुंबक लगाना चाहती है, जिससे ब्राह्मण वोट उनके खाते में खींचा चला आए। क्योंकि, सूबे के 10 फीसदी ब्राह्मणों का न सिर्फ अपना वोट है। बल्कि इतने ही वोट को प्रभावित करने की भी कुव्वत रखते हैं। मतलब, बिना ब्राह्मणों के शरण में गए यूपी के सिंहासन तक पहुंचना बहुत मुश्किल है।