ऐतिहासिक फैसला: अब हाजी अली दरगाह में जा सकेंगी महिलाएं, जानिए- क्या है दरगाह का इतिहास...

डॉ. संदीप कोहली, 

नई दिल्ली (26 अगस्त) : हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत मिल गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अब महिलाओं को दरगाह में मजार के भीतर तक जाने की अनुमति होगी। पहले महिलाएं सिर्फ बाहर तक ही जा पाती थीं, अंदर मजार तक जाने की अनुमति नहीं थी। बॉम्बे हाईकोर्ट इस भेदभाव के खिलाफ 2014 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। जिसमें मांग की गई थी कि जहां तक आदमी जा सकते हैं वहां तक औरतों को जाने की अनुमति क्यों नहीं है? 

जस्टिस वीएम कनाडे और जस्टिस रेवती मोहिते डेरे की खंडपीठ ने महिलाओं के हक में फैसला देते हुए कहा कि, संविधान में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का दर्जा है। जब पुरुषों को दरगाह के अंदर जाने की इजाजत है तो महिलाओं को भी होनी चा‍हिए। हाईकोर्ट की डबल बेंच के पास यह मामला इसी साल फरवरी से फैसले के लिए सुरक्षित रखा था। 

मामले में याचिकाकर्ता नूरजहां सफिया नियाज की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव मोरे ने हाई कोर्ट में पैरवी की। नूरजहां सफिया नियाज ने ही अगस्त 2014 में अदालत में याचिका दायर कर यह मामला उठाया था। हालांकि अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से मामला सुलझाने को भी कहा था, लेकिन दरगाह के अधिकारी महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ थे। गौरतलब है कि शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश की जंग जीत चुकीं भूमाता ब्रिगेड की नेता तृप्ति देसाई ने दरगाह में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए एक बड़ा आंदोलन किया था।

क्या था पूरा मामला...  - 2011 तक महिलाएं हाजी अली दरगाह में प्रवेश करती रहीं थीं। - महिलाएं हाजी अली दरगाह में दुआ, नमाज, शॉल और फूल अर्पित कर सकती थी।  - लेकिन 2012 के बाद से दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी।  - जिस जगह पर पवित्र कब्र यानि (जो गर्भगृह) है वहां बाद में महिलाएं नहीं जा सकती थीं। - इसी के विरोध में मुस्लिम महिलाओं ने आजाद मैदान में धरना भी दिया था। 

हाजी अली दरगाह मैनेजमेंट का तर्क...  - हाजी अली दरगाह मैनेजमेंट के मुताबिक महिलाएं गर्भगृह में नहीं जा सकती।  - क्योंकि शरिया कानून के मुताबिक महिलाओं का कब्रों पर जाना गैर इस्लामी है।  - हालांकि महिलाएं दरगाह के कैंपस में नमाज पढ़ सकती हैं।  - लेकिन जिस जगह पर पवित्र कब्र यानि जो गर्भगृह है वहां नहीं जा सकती।  - नवंबर 2012 में ट्रस्ट ने ये साफ कर दिया है कि उनका यह फैसला अंतिम है।  - सिर्फ हाजी अली ही नहीं, मुंबई के 20 में से 7 दरगाहों ने महिलाओं के मजार तक जाने पर पाबंदी लगा दी थी।  - जिसमें माहिम और दूसरी मशहूर दरगाह भी शामिल हैं। 

कोर्ट में अबतक क्या-क्या हुआ... अगस्त 2014- महिलाओं को मजार तक प्रवेश न मिलने के खिलाफ नूरजहां सफिया ने अगस्त 2014 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।  जुलाई 11, 2015- बॉम्बे HC कोर्ट के दरगाह के न्यासियों से कहा कि हाजी अली दरगाह महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के बारे में पुनर्विचार करें।  अक्टूबर 20, 2015- बॉम्बे HC में कहा कि हाजी अली दरगाह न्यास ने गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को सही बताया। फरवरी 10, 2016- महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे HC में अपना पक्ष रखते हुए कहा, हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी असंवैधानिक। अप्रैल 21, 2016 - हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के लिए 'हाजी अली सब के लिए'नाम का एक फोरम बनाया गया। 28 अप्रैल 2016- शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश की जंग जीत चुकीं भूमाता ब्रिगेड की नेता तृप्ति देसाई ने हाजी अली में एंट्री की मुहिम छेड़ी थी।

जानिए, दरगाह का इतिहास... - हाजी अली की दरगाह मुंबई के वर्ली की खाड़ी में स्थित है। - इसे सैय्यद पीर हाजी अली शाह बुखारी की याद में सन 1431 में बनाया गया था। - यह दरगाह मुस्लिम और हिन्दू समुदायों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है - मान्यता है कि हाजी अली उज्बेकिस्तान से सारी दुनिया का भ्रमण करते हुए भारत पहुंचे थे। - दरगाह सड़क से लगभग 400 मीटर की दूरी पर एक छोटे से टापू पर बनाई गई है। - हाजी अली की दरगाह पर जाने के लिए मुख्य सड़क से एक पुल बना हुआ है। - इस पुल की ऊंचाई काफी कम है और इसके दोनों ओर समुद्र है। - दरगाह तक सिर्फ लो टाइड के समय ही जाया जा सकता है। - बाकी समय में यह पुल पानी के नीचे डूबा रहता है। - दरगाह टापू के 4500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। - दरगाह और मस्जिद की बाहरी दीवारें सफेद रंग से रंगी हैं। - इस दरगाह की पहचान है 85 फीट ऊंची मीनार। - पीर हाजी अली की मजार पर लाल एवं हरी चादर से सजाया गया है। - मुख्य कक्ष में संगमरमर से बने कई स्तम्भ हैं जिनके ऊपर रंगीन कांच है। - रंगीन कांच पर कलाकारी कर अल्लाह के 99 नाम भी उकेरे गए हैं। - गुरुवार और शुक्रवार को दरगाह पर हर मज़हब के क़रीब 40,000 लोग आते हैं। - कभी कभी शुक्रवार को दरगाह पर क़व्वाली का भी आयोजन होता है। - फिल्म फि़जा में पीर हाजी अली के ऊपर एक कव्वाली फिल्माई गयी है। - फिल्म कुली का अंतिम दृश्य हाजी अली दरगाह में ही फिल्माया गया है।

 

पीर हाजी अली का चमत्कार... मान्यता है एक बार पीर हाजी अली शाह बुखारा में एक वीरान जगह में बैठे थे, तभी एक महिला वहां से रोती गुजरी। पीर के पूछने पर उसने बताया कि वह तेल लेने गई थी लेकिन बर्तन से तेल गिर गया और अब उसका पति उसे मारेगा। पीर उसे लेकर उस स्थान पर गए जहां तेल गिरा गया था, पीर ने उस महिला से बर्तन लिया और हाथ का अंगूठा जमीन में गाड़ दिया। ऐसा करते ही ज़मीन से तेल का फ़ौव्वारा निकल पड़ा और बर्तन भर गया।

लेकिन इस घटना के बाद पीर हाजी अली शाह को बुरे-बुरे ख्वाब आने लगे कि उन्होंने अपना अंगूठा जमीन में धसाकर पृथ्वी को ज़ख़्मी कर दिया। उसी दिन से वह गुमसुम रहने लगे और बीमार भी पड़ गए। फिर आपनी मां की इजाज़त लेकर वह अपने भाई के साथ भारत रवाना हो गए और मुंबई की उस जगह पहुंच गए जो दरगाह के करीब है। उनका भाई वापस अपने देश लौट गया।

पीर हाजी अली शाह ने अपने भाई के हाथ मां को एक ख़त भिजवाया और कहा कि उन्होंने इस्लाम के प्रचार के लिये अब यहीं रहने का फ़ैसला किया है और ये कि वह उन्हें इस बात के लिये माफ कर दें। पीर हाजी अली शाह अपने अंतिम समय तक लोगों और श्रृद्धालुओं को इस्लाम के बारे में ज्ञान बांटते रहे। अपनी मौत के पहले उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि वे उन्हें कहीं दफ्न न करें और उनके कफन को समंदर में डाला जाए। उनकी अंतिम इच्छा पूरी की गई और ये दरगाह शरीफ उसी जगह है जहां उनका कफन समंदर के बीच एक चट्टान पर आकर रुक गया था।