दलित शरणम गच्छामि के फॉर्मूले पर चल रही है बीजेपी

प्रवीण कुमार, अंबेडकर नगर (17 मई): देश के सबसे बड़े और अहम सियासी राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने में नौ महीने बाकी हैं। बीजेपी ने दो साल पहले यूपी की अस्सी में से तिहत्तर सीटें जीत ली थीं। कुछ वैसा ही करिश्मा नौ महीने बाद विधानसभा चुनाव में दिखाने के लिए बीजेपी इन दिनों दलित शरणम गच्छामि के फॉर्मूले पर चल रही है।  

87 साल के बौद्ध भिक्षु धम्म वीरियो की अगुवाई में निकली धम्म चेतना यात्रा की बस। जिसका कारवां यूपी में घूम रहा है। जहां यात्रा पहुंचती है, वहां यूपी के दलित पहुंच जाते हैं बौद्ध धर्मगुरु धम्म वीरियो का दर्शन करने। आप कहेंगे कि इस यात्रा का बीजेपी के साथ क्या कनेक्शन है ? इसमें तो बीजेपी का ना झंडा लगा है, ना डंडा लगा है। आप एकदम सही सोच रहे हैं, लेकिन सच ये नहीं है। इस बस के दूसरे हिस्से पर सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरे हैं। कहीं बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के आगे शीश झुकाते, कहीं संत रैदास की मूर्ति के आगे श्रद्धा के साथ बैठे मोदी नजर आते हैं। दिल्ली का लालकिला जीतने के बाद अब बीजेपी लखनऊ का लालकिला भी जीत सके इसका सीधा कनेक्शन इस धम्म चेतना यात्रा से है।

24 अप्रैल को यूपी के सारनाथ से धम्म चेतना यात्रा निकली है। इस यात्रा की अगुवाई 87 साल के बौद्ध भिक्षु धम्म वीरियो कर रहे हैं। धम्म वीरियो वहीं हैं जिन्होंने 14 अप्रैल को महू में मोदी के साथ मंच साझा किया था और इस यात्रा के बहाने दलित वर्ग में बीजेपी और प्रधानमंत्री का संदेश पंहुचाने और पैठ बढ़ाने का मकसद साधा जा रहा है। इस यात्रा के बहाने यूपी के दलितों के बीच घूम रहे  बौद्ध भिक्षु धम्म वीरियो कहते हैं कि वो तो वोटबैंक की राजनीति का प्रदूषण खत्म करने निकले हैं।

इन दिनों ये यात्रा यूपी के अंबेडकर नगर पहुंची है। यानी वो जगह जहां से खुद मायावती लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं। दावा है कि इस यात्रा में जब दलितों की भीड़ जुटती है तो ये बताना नहीं भूला जाता है कि धम्म वीरियो ने ही कांशीराम और मायावती को बौद्ध दीक्षा दिलाई थी। बौद्ध भिक्षु धम्म वीरियो भी ये कहने से नहीं हिचकते के उनकी यात्रा के पीछे बीजेपी-संघ के कुछ लोग हैं तो क्या बुराई है।

दरअसल बीजेपी को लगता है कि मायावती से दलित वर्ग के वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए जरूरी है कि बौद्ध धर्म के अनुयायियों को आगे किया जाए। यूपी में करीब 22 फीसदी दलित वोट हैं। 22 फीसदी दलित आबादी में जाटव लगभग 55 फीसदी हैं, जबकि 45 फीसदी हिस्सा पासी, खटिक, धानुक, वाल्मीकि समेत अन्य नाम से जानी जाने वाली जातियों का है। बीजेपी की नजर जाटव को छोड़कर बची बाकी 45 फीसदी दलित जातियों पर है। भले लोकसबा चुनाव में बीजेपी ने यूपी की सभा 17 आरक्षित सीटें अपने नाम की हों। लेकिन बौद्ध धम्म यात्रा के बहाने मायावती का दलित वोट खिसकाया जा सकेगा। इसकी गारंटी नहीं कही जा सकती।  

बीजेपी ने पिछड़े वर्ग से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य को यूपी में कमान सौंपी है। बीजेपी पासी समाज से आने वाले राजा सुहेल देव के नाम पर कार्यक्रम कर चुकी है। और यूपी में दलित वोटों को पाले में लाने के लिए घूम रही धम्म चेतना यात्रा और मकसद सिर्फ एक दलितों की जमीन पर पार्टी का झंडा डंडा गाड़कर लखनऊ का लालकिला जीतना।