'शहीद-ए-आजम' भगत सिंह का 111वां जन्मदिन आज, यहां जाने उनसे जुड़े कुछ अनसुने किस्से

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (28 सितंबर): देश के महान सपूत शहीद-ए-आजम भगत सिंह का आज 111वां जन्मदिन है। इस मौके पर पूरा देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए 23 की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे पर झूलने अमर शहीद भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। भगत सिंह बहुत छोटी उम्र से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और उनकी लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश हुक्मरान ने 23 मार्च 1931 को 23 बरस के भगत को फांसी पर लटका दिया था। भगत सिंह के पूर्वजों का जन्म पंजाब के नवांशहर के समीप खटकड़कलां गांव में हुआ था। इसलिए खटकड़कलां इनका पैतृक गांव है। भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह पहले सिख थे जो आर्य समाजी बने। इनके तीनों सुपुत्र किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे।13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्‍याकांड ने भगत सिंह पर गहरा असर डाला और वे भारत की आजादी के सपने देखने लगे। बताया जाता है कि उनके परिवार वालों जब उनकी शादी करनी चाही तो वह घर छोड़कर कानपुर भाग गए। अपने पीछे वे जो खत छोड़ गए, उसमें उन्‍होंने लिखा कि उन्‍होंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है। इसलिए कोई दुनियावी इच्‍छा या ऐशो-आराम उनको अब आकर्षित नहीं कर सकता।

भगत सिंह के भांजे सरदार जगमोहन सिंह ने शहीद-ए-आजम के जीवन से जुड़ी कई अनसुनी कहानियां लोगों तक पहुंचाई। बताया जाता है कि 8 साल की उम्र में एक बार सरदार भगत सिंह अपनी छोटी बहन के साथ बैठ कर पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान भगत सिंह कोई किताब पढ़ रहे थे। उसी समय उत्सुकता से छोटी बहन ने उनकी किताब देखने की कोशिश की। तब भगत सिंह ने अपनी 4 साल की बहन के सीने पर जलती लालटेन रख दी, जिससे वह कई जगह झुलस गई। जैसे ही वह चिल्लाई, भगत सिंह ने बहन का मुंह बंद करते हुए कहा कि चिल्लाना नहीं, मैं तो देखना चाहता था कि तुममें कितनी सहन शक्ति है। जब सहन शक्ति होगी, तभी देशभक्ति की राह में आगे चल पाओगी। भगत सिंह से यह बात सुनकर छोटी बहन ने अपनी पीड़ा को सहते हुए चिल्लाना बंद कर दिया।सरदार जगमोहन सिंह ने बताया कि भगत मामा बचपन से ही कसरत के बेहद शौकीन थे। वे लाहौर में हुई लट्ठबाजी प्रतियोगिता के चैम्पियन भी रहे। एक बार वो अपनी मां के साथ तांगे से कहीं जा रहे थे। कुछ दूर चलने के बाद तांगा एक गड्ढे में पलट गया, जिससे मामा के सीने की दो पसलियां दब गईं। उसी की वजह से वे नानी से कहते रहते थे- मैं इतनी कसरत करता हूं, लेकिन मेरा सीना पूरा नहीं फूलता। आपकी वजह से मेरी दो पसलियां दब गईं। आप मुझे लेकर नहीं गई होतीं तो शायद मेरी पसलियां न दबतीं और मेरा सीना पूरा फूलता।"जगमोहन सिंह के मुताबिक 'भगत सिंह तैराकी और नौका चलाने के बेहद शौकीन थे। वे कितने भी गहरे पानी में बांस के सहारे चल सकते थे। 1926 में कानपुर में भीषण बाढ़ आई। तब उन्होंने ने बीके दत्त के साथ मिलकर बाढ़ पीड़ितों को बचाने के लिए काफी दिनों तक कम किया था। मेरी मां बताती थीं कि लौटते वक्त उनके पैर का निचला भाग लगातार पानी में रहने के कारण गल गया था।'