बैंक अधिकारियों ने दलालों के हाथों 10% पर बेचे जनधन खाते!

नई दिल्ली ( 22 दिसंबर ): मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले से पहले जहां जनधन खाते बैंक अधिकारियों के लिए बोझ बन गए थे वहीं नोटबंदी के बाद इनकी कमाई का जरिया बन गए। कालाधन रखने वालों ने बैंक अधिकारियों से मिलकर इन खातों का खूब दुरुपयोग किया। पहले इन खातों में पैसे जमा किए गए और फिर निकाल भी लिए गए। पहले ही उनसे विदड्रॉल फॉर्म पर साइन करा लिए गए थे। ऐसी कई शिकायतें मिलने के बाद इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन विंग ने इन खातों की जांच शुरू कर दी है। 15 दिसंबर को आरबीआई ने इन्वेस्टिगेशन विंग को सभी जनधन खातों की सूची भी सौंप दी है। जांच पूरी होने के बाद कई लोगों को नोटिस भेजे जाने हैं।

इन्वेस्टिगेशन विंग के एक इंस्पेक्टर ने बताया कि कुछ मामले ऐसे मिले हैं जिसमें खातों में बड़ी रकम जमा हुई और 2 दिन बाद ही सारी रकम को निकाल लिया गया। इन मामलों की जांच चल रही है। इनमें देखा जा रहा है कि जिसका खाता है उसकी आर्थिक स्थिति क्या है। इसके साथ ही बैंक अधिकारियों की भूमिका को भी चेक किया जा रहा है। फिलहाल जांच पूरी होने के बाद आरबीआई को इसकी रिपोर्ट दी जाएगी।

आरडीसी स्थित एक बैंक के जनधन खाते में 9 नवंबर को अलग-अलग किस्तों में 10 लाख रुपये जमा किए गए। लेकिन कुछ दिन बाद ही कैश को नए नोट के रूप धीरे-धीरे करके निकाला गया। वहीं, अब भी अकाउंट में कुछ रकम बाकी है। इस खाते की जांच में पता चला है कि जिसका खाता है वह रिक्शा चलाता है। लेकिन उसके खाते में पैसा उसकी मर्जी से जमा करवाया गया। इसके लिए उसे एक लाख रुपये जमा करवाने के एवज में 5 हजार रुपये दिए गए। जबकि 1 लाख रुपये पर ही 5 हजार रुपये बैंक कर्मचारी को देने की बात सामने आई है।

ऑडिट करने पहुंचे बैंक अधिकारियों ने बताया कि कुछ बैंकों की तरफ से बड़े ट्रांजेक्शन की जानकारी फाइनैंशल इंटेलिजेंस को नहीं दी गई है। जबकि नियम है कि बैंकों में होने वाले बड़े और संदेहास्पद ट्रांजेक्शन की जानकारी फाइनैंशल इंटेलिजेंस को देनी होती है। ताकि वह मामले की जांच कर सके और गड़बड़ी मिलने पर एक्शन लिया जा सके। लेकिन बैंक अधिकारी खुद के इस ट्रांजेक्शन में शामिल होने की वजह से जानकारी देने से ही बचते रहे। लेकिन अब ऑडिट होने से गड़बड़ी करने वाले अधिकारी फंसेंगे।