अयोध्या विवाद: निर्मोही अखाड़ा ने केंद्र सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की नई याचिका

प्रभाकर मिश्रा, न्यूज 24, नई दिल्ली (9 अप्रैल): केन्द्र सरकार के अयोध्या में मंदिर के पास की जमीन के कुछ हिस्से के अधिग्रहण को वापस करने को लेकर दाखिल याचिका का निर्मोही अखाड़े ने विरोध कर दिया है। निर्मोही अखाड़े ने कहा है कि सरकार ने जमीन अधिग्रहण करके निर्मोही अखाड़े के कई मंदिरों को तबाह कर दिया था। कोर्ट ही इस मामले का निपटारा करे। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि जिस जमीन पर कोई विवाद नहीं है वो हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास को दे देना चाहिए।

निर्मोही अखाड़ा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को पहले भूमि विवाद का फैसला करना चाहिए। केंद्र के जमीन अधिग्रहण करने से अखाड़ा द्वारा संचालित कई मंदिर नष्ट हो गए। ऐसे में केंद्र को ये जमीन किसी को भी वापस करने के लिए नहीं दी जा सकती। साथ ही अखाड़ा ने ये भी कहा है कि रामजन्मभूमि न्यास को अयोध्या में बहुमत की जमीन नहीं दी जा सकती। अखाड़ा ने ये याचिका केंद्र सरकार की जनवरी की याचिका पर दाखिल की है जिसमें सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वो विवादित भूमि के अलावा अधिग्रहीत की गई जमीन को वापस लौटाना चाहता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी पर सुनवाई नहीं की है।

आपको बता दें कि 29 जनवरी को मोदी सरकार ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल के पास अधिग्रहित की गई 67 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगने के लिए कोर्ट पहुंची थी। मोदी सरकार ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की थी कि विवादित जमीन के अलावा बाकी जमीन लौटाई जाए। सरकार ने याचिका में कहा था कि विवाद 0.313 एकड़ जमीन पर है, इसलिए विवादित जमीन को छोड़कर बाकी जमीन को लौटाया जाए और इसपर जारी यथास्थिति हटाई जाए। सरकार ने अपनी अर्जी में 67 एकड़ जमीन में से कुछ हिस्सा सौंपने की अर्जी दी है।

गौरतलब है कि साल 1993 में केंद्र सरकार ने अयोध्या अधिग्रहण एक्ट के तहत विवादित स्थल और आसपास की जमीन का अधिग्रहण कर लिया था। और इसके अलावा पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल सभी याचिकाओं को खत्म कर दिया गया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी जजमेंट में 1994 में तमाम दावेदारी वाले सूट (अर्जी) को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास ही रखने को कहा था और निर्देश दिया था कि जिसके पक्ष में कोर्ट का फैसला आता है, जमीन उसे दी जाएगी। आपको बता दें कि करीब सात दशक पुराने बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि विवाद की अहम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सभी तीनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। जिसके बाद से ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए। इस फैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं माना और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी थी।