कमजोर तबके पर हमलों के साथ सख्ती से निपटना होगा-राष्ट्रपति प्रणब मुकर्जी

नई दिल्ली (15 अगस्त): स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में दलितों और अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों के परिप्रेक्ष्य में कहा कि इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए। कमजोर वर्ग पर हुए खिलाफ हिंसा के बारे में उन्होंने कहा कि यह पथभ्रष्टïता है। असहिष्णुता की ताकतों के संदर्भ में उन्होंने विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडे और समूहों तथा व्यक्तियों के ध्रुवीकरण करने वाले बहसों के 'बेवजह की कोशिशों के खिलाफ सतर्क किया। उन्होंने कहा कि इससे संस्थान का उपहास और संवैधानिक विध्वंस होता है। राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र सिर्फ आवधिक रूप से सरकार चुनने की प्रक्रिया मात्र नहीं है।

राष्ट्रपति के संदेश की खास बातें: - यह पांचवी बार है जब मैं स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर आपसे बात कर रहा हूं।

- हमारा लोकतंत्र न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के खंभों पर खड़ा है। जिसकी ताकत बढ़ती रही है।

- आजादी के 7 दशक बाद, करीब 125 करोड़ की भारत की जनता ने अपनी विभिन्नता के जरिए तब की भविष्यवाणी को गलत साबित कर दिया।

- जब 1947 में भारत को आजादी मिली थी, तब किसी को भरोसा नहीं था कि भारत एक लोकतंत्र के रूप में जीवित रह सकेगा।

- कमजोर तबकों पर हमले वो रुकावटें हैं, जो हमारे राष्ट्रीय मूल्यों को नुकसान पहुंचाती हैं। इनसे कड़ाई से निपटा जाना चाहिए।   - हमारा समग्र सामाजिक ज्ञान और राजनीति मुझे भरोसा देती है कि ऐसी ताकतें हमेशा ही दूर रहेंगी।

- महिलाओं और बच्चों को जो सुरक्षा और संरक्षा हम प्रदान करते हैं, वह देश और समाज में खुशहाली को सुनिश्चित करती है।

- महिला या बच्चों पर हिंसा की एक भी घटना सभ्यता की आत्मा पर एक घाव है। - हम खुद को सभ्य समाज नहीं कह सकते अगर महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकते।

- लोकतंत्र एक अंतराल पर अपने चुनाव के आधार पर सरकार चुनने के अभ्यास से कहीं बढ़कर है।

- स्वतंत्रता के वृक्ष को नियमित तौर पर लोकतांत्रिक संस्थानों के माध्यम से पोषण आवश्यक होता है।

- अवरोध पैदा करने की प्रवृत्ति और बिना सोचे-समझे अलगाववादी राजनीतिक एजेंडे को अपनाने से लोकतंत्र के संस्थानों का उपहास होता है।

- ध्रुवीकरण की बहस समाज में बांटने वाली लकीरें खींचती हैं।

- हमारा संविधान केवल एक राजनैतिक और कानूनी दस्तावेज नहीं है। बल्कि एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक अनुबंध है।

- संविधान ने देश के हर अंग के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को साफ-साफ परिभाषित किया है।

- जहां तक अधिकारों और देश के संस्थानों की ताकत का सवाल है, संविधान ने मर्यादा के मूल्य स्थापित किए हैं।

- संविधान की आत्मा को पदाधिकारी मर्यादा के साथ अपने कर्तव्यों को पूरा कर जीवित रख सकते हैं।

- एक विशेषता जिसने भारत को एकजुट रखा है वह है एक दूसरे की संस्कृतियों, मूल्यों और आस्था का सम्मान।

- बहुलता का सही अर्थ अनेकता और विविधता का सम्मान करना है।

- आज के जुड़े हुए वातावरण में ख्याल करने वाला समाज तभी विकसित हो सकता है, जब धर्म और आधुनिक विज्ञान में समरसता हो।

- हमें किस्मत को अपने हाथों में लेकर हमें अपने सपनों का भारत बनाना होगा।

- मजबूत राजनैतिक इच्छा के साथ हमें ऐसे भविष्य का निर्माण करना है, जो 60 करोड़ युवाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त करे।

- जैसा कि हम स्मार्ट शहरों, कस्बों और गांवों वाला भारत बना रहे हैं। हमें यह सुनिश्चित करना है कि वे मानवीय, हाई-टैक और खुशहाल जगह बनें।

- हमें अपनी आस्थाओं पर सवाल करते हुए वैज्ञानिक नजरिए को बढ़ावा देना होगा, जो वैज्ञानिक सोच से नहीं मिलती।

- हमें यथास्थिति को चुनौती देना सीखना होगा। अक्षमता और असावधानीपूर्ण कार्यों को अस्वीकार करना भी।

- प्रतियोगितापूर्ण वातावरण में, तेजी और थोड़े अधैर्य का भाव भी आवश्यक गुण है।

- भारत तभी बढ़ेगा, जब पूरा भारत बढ़ेगा; विकास की प्रक्रिया में हर किसी को शामिल करना होगा, उन्हें भी जिन्हें अभी तक नहीं किया गया।

- पीड़ित और वंचितों को भी मुख्यधारा में लाना होगा।

- तकनीकी विकास के युग में मशीनें इंसानों को पीछे छोड़ रही हैं।

- ऐसे में अस्तित्व में बने रहने के लिए ज्ञान और कौशल हासिल करना और आविष्कार करना बेहद जरूरी है।

- हमें एक देश के तौर पर रचनात्मकता, विज्ञान और प्रोद्योगिकी को पोषित करना होगा। - हम अक्सर अपने गुजरे हुए कल की उपलब्धियों पर खुश होते हैं, लेकिन अपनी ख्याति पर ही टिके रहना गलत है।

- ये बेहद अहम है कि भविष्य की ओर देखा जाए। यह समय है कि हम सहयोग, आविष्कार और विकसित होने में हाथ बंटाएं।

- भारत की हाल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले सालों में यह 8 फीसदी से ऊपर रही है।

- हमें अपनी ताकतों को बनाना होगा। जिससे कि ये सतत रूप से आगे बढ़ाई जाती रहे।

- हमारी विदेशनीति ने हाल ही में काफी गति दिखाई है। 

- हमने अपनी ऐतिहासिक दोस्ती और परंपरागत सहयोगी अफ्रीका और एशिया पैसिफिक में रिश्तों को मजबूत किया है।

- हम सभी देशों से आपसी लाभ और साझा मूल्यों पर आधारित रिश्तों को नए सिरे से जोड़ने की प्रक्रिया में हैं।

- विदेशनीति में भारत का ध्यान शांति-पूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व और ईको-डेवलेपमेंट के लिए तकनीकी और संसाधनों को विकसित करने पर है।

- दुनिया ने कई आतंकी गतिविधियों का सामना किया है। जिनकी जडें धर्म के आधार पर लोगों को बहकाने तक जुड़ी हुई हैं।

- ऐसी बातें सभी देशों के लिए खतरा पैदा करते हैं। पूरे विश्व को एक आवाज में बिना किसी शर्त के इससे लड़ना होगा।

- उपनिषदों को उद्धृत करता हूं: ईश्वर हमारी रक्षा करे। ईश्वर हमें पोषित करे। हम सभी ऊर्जा और जोश के साथ मिलकर काम करते रहें।

- हमारे अध्ययन उत्तम होते रहें। आपस में हममे कोई बैर ना हो। केवल शांति हो, शांति हो, शांति हो।