जानें, ज्योतिरादित्य की जगह राहुल गांधी ने कमलनाथ पर क्यों जताया भरोसा ?

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (14 दिसंबर): विधानसभा चुनाव में मिली कामयाबी के बाद  कांग्रेस अलाकमान ने मध्यप्रदेश की कमान वरिष्ठ नेता कमलनाथ के हाथ में सौंपने का फैसला किया है। कमलनाथ मध्यप्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में 17 दिसंबर को पद की शपथ लेंगे। कांग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद कल रात भोपाल में कमलनाथ को नेता चुने जाने का ऐलान किया गया। जिसके बाद उनका मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था। कमलनाथ संजय गांधी के दोस्त और राजीव गांधी के साथी रह चुके हैं। कमलनाथ का जन्म 18 नवंबर 1946 को कानपुर में हुआ था। दून स्कूल में पढ़ाई करने वाले कमलनाथ की संजय गांधी के साथ बचपन से ही दोस्ती थी।  स्कूली पढ़ाई के बाद कमलनाथ कोलकाता के सेंट जेविएर कॉलेज से ग्रेजुएशन करने गए। इसके बाद उन्होंने अपना करियर एक बिज़नेसमैन के तौर पर आगे बढ़ाया। मौजूदा वक्त में वो और उनका परिवार कई कंपनियों का संचालन करता है। उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है और ये पैसा छिंदवाडा के विकास पर जमकर खर्च किया गया है। केंद्र सरकार में कपड़ा मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय संभाल चुके कमलनाथ इंदिरा गांधी के जमाने से गांधी परिवार के करीबी रहे हैं। एक दौर ऐसा था कि मध्यप्रदेश में बिना कमलनाथ की मंजूरी के कांग्रेस पार्टी में पत्ता भी नहीं हिल सकता थ। इस चुनाव में कांग्रेस ने फिर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी और 15 साल बाद मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने के बादा उन्हें सत्ता की चाभी सौंप दी।

कहते हैं कमलनाथ की चक्की देर से चलती है लेकिन बारीक पीसती है। मध्यप्रदेश की सियासत में इस बात का बड़ा ही गहरा मतलब है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की चुनावी रणनीति किसी को समझ में नहीं आती और अगर समझ आती है तो तब आती है जब उसका तोड़ ढूंढने का वक्त निकल चुका होता है। जिस दिन कमलनाथ को मध्यप्रदेश की कमान सौंपी गई थी उसी दिन शिवराज एंड कंपनी को सतर्क हो जाना चाहिए था कि असली खिलाड़ी मैदान में उतर गया है रणनीति बदल देनी चाहिए। खैर मध्यप्रदेश में 15 साल के बीजेपी राज की चूलें हिला देने वाले कांग्रेसी का नाम है कमलनाथ। बीजेपी के दिग्गज नेताओं को उनके गढ़ में घेरने वाले रणनीतिकार का नाम है कमलनाथ । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साले संजय सिंह को कांग्रेस में लाकर बीजेपी का घर कमज़ोर करने वाले चुनावी प्रबंधक का नाम है कमलनाथ । और मतभेदों के बावजूद साथियों के साथ तालमेल बैठा कर शिवराज का आत्मविश्वास हिला देने वाले शख्स का नाम कमलनाथ है।

देश की राजनीति में कमलनाथ की पहचान छिंदवाड़ा से है और छिंदवाड़ा की पहचान कमलनाथ से है। छिंदवाड़ा मतलब सिर्फ़ कमलनाथ। आज की तारीख में मध्यप्रदेश की इस लोकसभा सीट को जीतने के बारे में कोई और सोच भी नहीं सकता। 1980 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले कमलनाथ अब तक इस सीट को 9 बार जीत चुके हैं। उनके नाम देश में सबसे ज्यादा बार लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है। 1996 के चुनाव में उनकी पत्नी को भी इस सीट पर जीत हासिल हो चुकी है। चुनाव चाहे विधानसभा का हो या लोकसभा का कमलनाथ के विरोधियों के पास सिर्फ़ एक मुद्दा होता है और वो हैं खुद कमलनाथ।अब तक माना जाता था कि छिंदवाड़ा में कमलनाथ की तूती बोलती है लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव ने साबित किया है कि न सिर्फ़ छिंदवाड़ा बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास अगर कोई धुरंधर है तो वो कमलनाथ हैं। वो ऐसे नेता हैं जो हर सियासी फन में माहिर हैं। कांग्रेस के इस धनुर्धर के तरकश में वो सारे तीर हैं जो बीजेपी को हराने का लक्ष्य भेदने के लिए ज़रूरी है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से ठीक सात महीने पहले यानी अप्रैल 2018 में कमलनाथ को पीसीसी की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद कमलनाथ ने कांग्रेस को जीत की राह पर लाने के लिए ऐसी रणनीति बनाई जिसके बारे में पहले किसी ने नहीं सोचा था।

कमलनाथ ने इस बार टिकट बंटवारे में बड़ी भूमिका निभाई और ख़ास रणनीति के तहत टिकट बांटे। उनका साफ कहना था कि उम्मीदवार जिताऊ होना चाहिए। फिर चाहे वो पैराशूट कैंडिडेट हो या दूसरे दल से आया हो। कमलनाथ ने सज्जन सिंह वर्मा, अरुण यादव, लक्ष्मण सिंह और विजयलक्ष्मी साधो जैसे पूर्व सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने का फैसला किया। इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी को भी चुनाव लड़ाया जिससे बीजेपी के कई दिग्गज अपने ही घर में घिर गए। कमलनाथ ने एमपी में सभी प्रमुख जाति वर्गों के प्रमुखों के साथ पीसीसी में कई बैठकें कीं। उन्हें टिकट देने का भरोसा दिया और बाद में टिकट भी दिए। सिंधी समाज से लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी टिकट देकर जातीय समीकरणों को बखूबी साधा। महिलाओं और युवाओं के तौर पर कई नए चेहरे भी चुनावी मैदान में उतारे।

सपाक्स आंदोलन को देखते हुए कमलनाथ ने तय किया कि कांग्रेस बीएसपी और एसपी से समझौता नहीं करेगी। वो नहीं चाहते थे कि सवर्ण वोटर कांग्रेस से नाराज़ हों। हालांकि दोनों पार्टियों के कई नेताओं को कमलनाथ की वजह से कांग्रेस में शामिल कराया गया। कमलनाथ ने एमपी के वोटर से वादा किया है कि सत्ता में आते ही बिजली का बिल हाफ होगा, किसान का कर्ज माफ होगा और आरएसएस की शाखाओं में सरकारी कर्मचारियों के जाने पर पाबंदी लगाई जाएगी। कमलनाथ की अगुवाई में कांग्रेस ने एमपी की जनता से हर ग्राम पंचायत में गौशाला बनाने और एक राम वन गमन पथ बनाने का वायदा भी किया। पार्टी की रैलियों में कमलनाथ ने विरोधियों की हर रणनीति और हर मुद्दे की काट जनता के सामने रखी। खासतौर पर सॉफ्ट हिन्दुत्व को लेकर। चुनाव प्रचार के दौरान कमलनाथ ने कहा कि कोई सॉफ्ट या हार्ड हिन्दुत्व नहीं होता है। हम सब धर्म प्रेमी हैं। हम धर्म को राजनीतिक मंच पर नहीं ले जाते। जब हम मंदिर जाते हैं तो उनके पेट में दर्द होता है, क्यों दर्द होता है ? क्या ये हम से ज्यादा धर्म प्रेमी हैं ? क्या उन्होंने धर्म का ठेका ले रखा है ? चुनाव प्रचार के दौरान कमलनाथ ने ऐसे कई सवाल पूछे जिनका जवाब बीजेपी के किसी भी नेता के लिए देना मुश्किल था। कमलनाथ ने कहा कि राष्ट्रवाद की बात करते हैं। ये क्या कांग्रेस को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाएंगे ? मैं तो पूछना चाहता हूं मोदी जी से एक व्यक्ति का नाम बता दीजिए जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आपकी पार्टी में हों ? मुझे एक नाम बता दीजिए ?

कमलनाथ वो नेता हैं जो अपनी सूझ-बूझ से ऐन मौके पर हवा का रुख मोड़ने का दम रखते हैं। इस विधानसभा चुनाव में भी ऐसे कई मौके आए जब विरोधियों ने भावनात्मक मुद्दों के ज़रिए उन्हें घेरने की कोशिश की। लेकिन जो किसी चाल में फंस जाए वो कमलनाथ नहीं। 28 नवंबर को मध्यप्रदेश में मतदान से ठीक एक दिन पहले यानी 27 नवंबर को कमलनाथ ने छिंदवाड़ा ने हनुमानजी की विशालकाय मूर्ति की पूजा की। अपनी कर्मभूमि में कमलनाथ ने अपनी आस्था के दम पर उन कोशिशों को नाकाम कर दिया जिनमें लोगों को धर्म के आधार पर बांटा जा रहा था।

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