5 राज्यों के चुनाव नतीजों के पूरे देश के लिए 10 बड़े मायने

नई दिल्ली (19 मई) :  चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव नतीजे आ गए हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल जैसे चार राज्यों के साथ केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के चुनाव नतीजों के पूरे देश के लिए टॉप 10 क्या निष्कर्ष निकल रहे हैं, जानिए-

1. भगवा हो रहा है भारत!

किसी वक्त कांग्रेस एक अकेली पार्टी थी जिसकी देश के हर राज्य में पहुंच मानी जाती थी। अब उसी स्थिति में बीजेपी धीरे-धीरे परंतु निश्चित रूप से पहुंचती जा रही है। असम में भारी जीत से बीजेपी ने ऐसी धारणाओं को गलत साबित कर दिया है कि बीजेपी सिर्फ हिंदी पट्टी क्षेत्र की पार्टी है। अब भारत के राजनीतिक नक्शे को देखें तो इस पर भगवा रंग चढ़ता जा रहा है। बीजेपी की अब देश के 9 राज्यों में सरकारें हैं और चार राज्यों में ये सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है।

2. कांग्रेस का खस्ताहाल जारी

कांग्रेस के हाथ से दो और राज्य- असम और केरल निकल गए हैं। ये तो गनीमत है कि कोर्ट के दखल के बाद उत्तराखंड में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार बच गई। देश में अब 29 राज्यों में कांग्रेस की अब केवल 6 राज्यों में ही सरकारें हैं। पुड्डुचेरी केंद्रशासित प्रदेश में भी अब कांग्रेस की सरकार आ गई। लेकिन बड़े राज्यों की बात की जाए तो अब सिर्फ कर्नाटक ही कांग्रेस के पास बचा है।

3. राहुल गांधी 2.0 वर्शन को अपडेशन की ज़रुरत

कांग्रेस के लिए कोई भी दांव सही नहीं बैठ रहा। यहां तक कि राहुल गांधी वर्शन 2.0 भी पार्टी की उम्मीदों के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रहा। पिछले साल लंबी छुट्टी से राहुल लौटे तो उनके तेवरों ने पार्टी में उम्मीद जगाई थी। उनके जुमले 'मोदी सरकार सूट बूट की सरकार  है' ने असर भी दिखाया था। लेकिन राहुल की बातों में दोहराव, कांग्रेस के पास प्रभावी नारों और विचारों की कमी ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। राजनीति को घटनाओं की श्रृंखला समझने की जगह एक प्रक्रिया माना जाना चाहिए जिसमें लोगों से सतत जुड़ाव की ज़रूरत होती है। जिस तरह रोहित वेमुला या जेएनयू आंदोलन में सक्रियता दिखाई गई वैसी ही सक्रियता अरुणाचल या उत्तराखंड में पार्टी के असंतुष्टों से उपजे संकट को भी सुलझाने में दिखाई जानी चाहिए थी.   

4. स्थानीय नेतृत्व से जुड़े मुद्दे

बीजेपी ने दिल्ली और बिहार की करारी हार से सही सबक लिए। पार्टी ने जाना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के दम पर ही हर चुनाव नहीं जीता जा सकता। विधानसभा चुनाव बिल्कुल अलग बात हैं। यहां मुख्यमंत्री के उम्मीदवार को प्रोजेक्ट करना सही रहता है। यही वजह है कि असम में सर्वानंद सोनोवाल को बीजेपी ने सीएम उम्मीदवार के तौर पर पेश किया। साथ ही असम में बीजेपी ने 'बिहारी बनाम बाहरी' जैसी   बहस से परहेज करना बेहतर समझा।   

5. पश्चिम बंगाल- चुनाव सिर्फ अंकगणित से नहीं जीते जा सकते

राजनीति हमेशा आंकड़ों का खेल नहीं होता। कई बार लोकल कैमिस्ट्री अंकगणित पर भारी पड़ती है। बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को पास लाने में राहुल गांधी ने कैटेलिस्ट (उत्प्रेरक) का काम किया था। आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस के एकजुट होने पर बीजेपी इसके सामने कहीं नहीं टिक पाई। अगर 2014 लोकसभा चुनाव को देखा जाए तो टीएमसी को 39.7 फीसदी वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस-लेफ्ट को मिला कर 39.64 फीसदी वोट मिले थे। इस अंकगणित की वजह से कांग्रेस और लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल में हाथ मिलाया सिर्फ इस मकसद से कि ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर किया जाए। अब यही लेफ्ट और कांग्रेस केरल में एक दूसरे से भिड़ते दिखे। ऐसे में ममता की वोटरों के साथ कैमिस्ट्री कांग्रेस और लेफ्ट के अंकगणित पर भारी पड़ी।    

 

6. मोदी बनाम कौन? राहुल, केजरीवाल, नीतीश और अब ममता?

राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में अब बड़ा सवाल है कि 2019 लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को मुख्य चुनौती देने वाला कौन होगा। ये सवाल हर आने वाले दिन के साथ अब बड़ा होता जाएगा। चुनौती पेश करने वालों में राहुल गांधी के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम लिए जाते रहे हैं। अब मोदी को चुनौती देने वाले दावेदारों में ममता बनर्जी का भी नाम जुड़ जाएगा।

7. भ्रष्टाचार :  सिर्फ अकेला मुद्दा नहीं?

अगर किसी राजनीतिक दल के बस्ते में मतदाताओं को देने के लिए बहुत कुछ है तो आप अपने खिलाफ़ भ्रष्टाचार के एक-दो दाग़ों से भी पार पा सकते हैं। यही वजह है कि सारदा और नारदा जैसे मुद्दे भी ममता बनर्जी को दोबारा सत्ता वापसी में आने से नहीं रोक सके। भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा रहता तो तमिलनाडु में 2जी की वजह से डीएमके का सफाया हो जाना चाहिए था।लेकिन इस बार वो मज़बूत विपक्ष के तौर पर उभरा है।

8. सत्ता विरोधी लहर का मिथक

सत्ता विरोधी फैक्टर की बात की जाए तो इस बार जनादेश मिश्रित रहा। ममता बनर्जी और जयललिता ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इस तथ्य को झुठलाया। वहीं तरुण गोगोई का असम की सत्ता में पिछले 15 साल से काबिज होना उनके रास्ते में बड़ी बाधा बन गया।

 

9 भारतीय राजनीति में उम्र कोई मुद्दा नहीं

हर कोई कहता है कि भारत युवा देश है। लेकिन इसके नेताओं की बात की जाए तो लेफ्ट के वी एस अच्युतानंदन 93 साल के है। भारतीय परंपरा के मुताबिक अच्युतानंदन को वानप्रस्थ में होना चाहिए था लेकिन केरल में वो अपनी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। ये चुनाव कई उम्रदराज़ नेताओं के लिए टॉनिक साबित हुआ है। इस मुद्दे पर अगर केंद्र में लाल कृष्ण आडवाणी की टिप्पणी करते हैं तो उसे सुनना दिलचस्प होगा।

10. बीजेपी बनाम क्षेत्रीय दल

तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस उठ नहीं पा रही, ऐसे में अब अधिक से अधिक मुकाबला बीजेपी बनाम क्षेत्रीय दल होता जा रहा है। अगले साल उत्तर प्रदेश में चुनाव के दौरान बीएसपी और एसपी जैसे दो बड़े छोरों के सामने बीजेपी खुद को तीसरे बड़े छोर के तौर पर पेश करने के लिए पूरा ज़ोर लगाएगी। कांग्रेस की कोशिश बिहार जैसे ही गठबंधन की तर्ज पर मोर्चा बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की रहेगी।