दिल्ली में कृत्रिम बारिश की तैयारी, जानें कैसे होती है क्लाउड-सीडिंग

नई दिल्ली (7 नवंबर): दिल्ली में प्रदूषण और स्मॉग की वजह से लोगों का हाल बेहाल है। इस प्रदूषण और स्मॉग पर तत्काल निजात पाने का कृत्रिम बारिश की बात करवाने की बात की जा रही है। बताया जा रहा है कि आर्टिफिशियल बारिश से दिल्ली में प्रदूषण पर तत्काल काबू पाया जा सकेगा। 

कैसे होती है कृत्रिम बारिश...

- सिल्वर आयोडाइड को विमान के जरिए आकाश में बादलों के बहाव के साथ फैलाया जाता है
- सिल्वर आयोडाइड क्रिस्टल नैचुरल बर्फ की तरह ही होती है
- प्लेन में सिल्वर आयोडाइड के दो जनरेटर होते हैं इनमें सिल्वर आयोडाइड का सोल्यूशन हाई प्रेशर के साथ भरा जाता है
- जहां क्लाउड-सीडिंग करवानी है वहां प्लेन को अपोजिट डायरेक्शन में उड़ाया जाता है
- जैसे ही परफेक्ट क्लाउडिंग यानि नमी वाले बादल दिखते हैं जनरेटर ऑन कर दिया जाता है
- प्लेन किस दिशा में उड़ेगा इसका निश्चय क्लाउड-सीडिंग ऑफिसर मौसम के आंकड़ों को ध्यान में रखकर करता है
- ये केमिकल्स आकाश में बादलों से टकराकर केमिकल एक्‍शन के जरिए बारिश करते हैं
- क्लाउड-सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश तभी सफल होती जब बादलों में वाष्पीकरण की क्षमता हो

प्लेन के अलावे मिसाइल के जरिए भी कृतिम बारिश कराई जाती है। चीन की राजधानी बीजिंग में मिसाइल के जरिए आर्टिफिशियल रेन करवाई गई थी। इसमे रॉकेट की तरह दिखने वाले इन यंत्रों में केमिकल भरकर आकाश में छोड़े जाते हैं। केमिकल्स के तौर पर सिल्वर आयोडाइड का सोल्यूशन होता है। ये केमिकल्स आकाश में बादलों से टकराकर केमिकल एक्‍शन के जरिए बारिश करते हैं। इसके जरिए 20 किलोमीटर तक के इलाके में बारिश कराई जा सकती है। 

ऐसा माना जाता है कि प्लेन से क्लाउड-सीडिंग करना ना सिर्फ महंगा है बल्कि इसके मात्र 40 पर्सेंट सक्ससेफुल होने के चांस होते हैं। जबकि मिसाइल सस्ती पड़ती है और 80 फीसदी तक सफल होती है।

बारिश टालने के लिए भी क्लाउड-सीडिंग कराई जाती है। 2008 में 29 वें बीजिंग ओलंपिक के दौरान भी क्लाउड-सीडिंग की गई थी। चीन में 21 जगहों पर मिसाइल के जरिए क्लाउड-सीडिंग की गई। इससे ओलंपिक गेम्स के दौरान बीजिंग में बारिश का खतरा टाला गया था।