चीन को थर्राने के लिए भारत ने तैनात किया ये ''ब्रह्मास्त्र'', जानिए क्या है खासियत...

डॉ. संदीप कोहली, नई दिल्ली (3 अगस्त): चीन से मुकाबला करने के लिए पूर्वोत्तर में तैनात की जाएगी दुनिया की सबसे तेज ब्रह्मोस 'BrahMos' सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल। केंद्र सरकार ने सेना को पूर्वोत्तर में चीन के खिलाफ पारस्परिक शक्ति संतुलन बनाने के लिए ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के अत्याधुनिक संस्करण को तैनात करने की मंजूरी दे दी है। यह मिसाइल चीन के साथ लगी 4,057 किमी लंबी सीमा पर पड़ोसी देश की तरफ से बढ़ाए जा रहे सैन्य ताकत का मुकाबला करने में सक्षम है। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी की बैठक में 4,300 रुपए से अधिक की लागत से तैयार ब्रह्मोस रेजिमेंट को मंजूरी दे दी। 

वजन- 3,000 KG(सेना और नौसेना), 2,500 KG(वायुसेना) गति-  2.8 मैक (3,400 किमी) से 3.0 तक (3,700 किमी)  लंबाई- 8.4 मीटर व्यास- 0.6 मीटर वारहेड- 250 KG पारम्परिक, 300 KG न्यूक्लियर वॉर-हेड उड़ान सीमा- 290-300 किमी तक उड़ान ऊंचाई- अधिक 14 किमी ((46,000 फीट)

- ब्रह्मोस के एक रेजिमेंट में करीब 100 मिसाइलें, 12x12 हेवी ट्रक के साथ 5 मोबाइल लॉन्चर और एक मोबाइल कमांड पोस्ट शामिल है। - चीनी की विशाल सेना को जवाब देने के लिए ब्रह्मोस के ब्लॉक-3 वर्जन को अरुणाचल प्रदेश में तैनात किया जाएगा। - ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जो 290 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है। - ब्रह्मोस की स्पीड 2.8 मैक है, जो कि इसे दुनिया की तेज स्पीड वाली मिसाइल बनाती है।  - सुपरसोनिक गति पर ब्रह्मोस 3,400-3,700 किमी प्रति घंटा और 1 किमी प्रति सेकेंड की रफ्तार से उड़ेगी। - यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल न्यूक्लियर और पारम्परिक वॉर-हेड दोनों को ले जाने में सक्षम है। - 2007 में ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम को भारतीय सेना के सैन्य बेड़े में शामिल किया गया था।  - भारतीय सेना के पास मौजूदा समय में ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम के तीन रेजिमेंट हैं।  - एक रेजिमेंट में करीब 100 मिसाइलों के साथ 5 मोबाइल लॉन्चर और एक मोबाइल कमांड पोस्ट होती है। - एक सब-सोनिक मिसाइल की तुलना में ब्रह्मोस में 9 गुना ज्यादा एनर्जी है जो दुश्मन के इलाके में ज्यादा तबाही मचा सकती है।  - ब्रह्मोस मिसाइल को भारत ने रूस के साथ मिलकर बनाया है, इसके तीन वर्जन बनाए गए हैं, थल, जल और वायु। - ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को पनडुब्बी, युद्धपोत, जमीन और विमान से दागा जा सकता है। - 25 जून 2016 को भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान सुखोई-30 ने पहली बार ब्रह्मोस के साथ सफलतापूर्वक उड़ान भरी। - इस उड़ान के साथ ही भारतीय वायुसेना दुनिया की पहली ऐसी एयरफोर्स बन गई है जिसके जंगी बेड़े में यह मिसाइल शामिल हो गई है।  - साथ ही इसके बाद भारतीय सेना के तीनों अंगों थल, जल व वायु के पास यह बेहतरीन मिसाइल उपलब्ध हो गई है। - सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रह्मोस को मार गिराना लगभग असंभव है। इसकी गति ध्वनि से तीन गुना अधिक है। - बहुत नीची उड़ान भरने के कारण इसे किसी राडार की सहायता से पता लगा पाना भी असंभव है।

ब्रह्मोस मिसाइल की खासियत

- यह हवा में ही मार्ग बदल सकती है और चलते फिरते लक्ष्य को भी भेद सकती है। - इसको वर्टिकल या सीधे कैसे भी प्रक्षेपक से दागा जा सकता है। - यह मिसाइल तकनीक थलसेना, जलसेना और वायुसेना तीनों के काम आ सकती है। - यह 10 मीटर की ऊँचाई पर उड़ान भर सकती है और रडार की पकड में नहीं आती। - रडार ही नहीं किसी भी अन्य मिसाइल पहचान प्रणाली को धोखा देने में सक्षम है। इसको मार गिराना लगभग असम्भव है। - ब्रह्मोस अमरीका की टॉम हॉक से लगभग दुगनी अधिक तेजी से वार कर सकती है, इसकी प्रहार क्षमता भी टॉम हॉक से अधिक है। - आम मिसाइलों के विपरित यह मिसाइल हवा को खींच कर रेमजेट तकनीक से ऊर्जा प्राप्त करती है। - यह मिसाइल 1200 यूनिट ऊर्जा पैदा कर अपने लक्ष्य को तहस नहस कर सकती है। - ब्रह्मोस मिसाइल दो इंधन से चलती है प्रथम चरण में solid propellant booster और दूसरे चरण में liquid-fueled ramjet होता है। - पहले चरण में Solid propellant booster इंजन को सुपरसोनिक गति प्रदान करता है और फिर अलग हो जाता है  - जबकि दूसरे चरण का liquid-fueled ramje मिसाइल को क्रूज चरण में 3 मैक तक ले जाता है। - ब्रह्मोस मिसाइल स्टील्थ (Stealth) प्रौद्योगिकी के साथ निर्देशन प्रणाली से युक्त है, मिसाइल ‘दागो और भूल जाओ’ सिद्धांत पर कार्य करती है। - ब्रह्मोस मिसाइल की क्रूजिंग एल्टीट्यूड 15 किमी. तक हो सकता है और इसका टर्मिनल एल्टीट्यूड न्यूनतम 10 मीटर है।

2024 तक आएगा ब्रह्मोस का हाइपरसोनिक वर्जन 'ब्रह्मोस-II'

- ब्रह्मोस के सुपरसोनिक वर्जन के अलावा ब्रह्मोस हाइपरसोनिक वर्जन की भी तैयारी हो रही है। - ब्रह्मोस-II की यह मिसाइल हाइपरसोनिक गति से उड़ान भरेगी, इसकी गति ध्वनि से 7 गुना अधिक होगी।  - हाइपरसोनिक गति पर ब्रह्मोस-II 8,575 किमी प्रति घंटा और 2.3 किमी प्रति सेकेंड की रफ्तार से उड़ेगी। - ध्वनि की गति से पांच से दस गुना के बीच की रफ्तार को हाइपर सोनिक कहा जाता है। - ध्वनि से सात गुना अधिक गति होने के कारण यह अपने लक्ष्य पर सामान्य वारहेड की अपेक्षा तीस गुना अधिक मारक क्षमता से मार कर सकेगी। - ब्रह्मोस-II का पहला टेस्ट 2017 में होने की उम्मीद है, 2024 तक तीनों सेनाओं में शामिल किया जा सकता है।

ब्रह्मोस नाम कैसे पड़ा...

- 12 फरवरी, 1998 को मॉस्को में भारत और रूस के बीच एक समझौता हुआ था। - भारत के शीर्ष रक्षा वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति स्व.एपीजे अब्दुल कलाम और रूस के उपरक्षामंत्री मिखाइलोव के बीच हुआ था समझौता। - समझौते के तहत भारत के DRDO और रूस की NPO के मध्य एक संयुक्त उपक्रम ‘ब्रह्मोस एयरोस्पेस’ की स्थापना हुई। - इस साझेदारी का उद्देश्य विश्व की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का डिजाइन, विकास, विनिर्माण और बिक्री करना था। - ब्रह्मोस मिसाइल का नामकरण भारत की ब्रह्मपुत्र नदी 'ब्रह्म' और रूस की मोस्कोवा नदी 'मोस' के नाम पर किया गया है। - ब्रह्मोस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 12 जून, 2001 को अंतरिम परीक्षण रेंज, चांदीपुर, ओडिशा से किया गया था। - साल 2005 में भारतीय नौसेना में ब्रह्मोसके पहले संस्करण को शामिल किया गया। - भारतीय सेना में भी ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की तीन रेजीमेंटों को शामिल किया गया है।