... तो इतनी लंबी है कोहिनूर के दावेदारों की लिस्ट

हरीश दुबे, जबलपुर (20 अप्रैल): कोहिनूर के साथ एक बड़ा सच जुड़ा है। ये सच है कि ये कभी बिका नहीं। इसे या तो तलवार के दम पर लूटा गया या फिर तिकड़म से हड़प लिया गया। इतिहास गवाह है कि इसे कई बार तोहफे के रूप में भी दिया गया। बाबर की आत्मकथा में इसकी खासियत बताते हुए लिखा गया है कि ये हीरा इतना महंगा है कि इसकी कीमत से पूरी दुनिया को ढाई दिन तक खाना खिलाया जा सकता है। इसके दावेदारों की लिस्ट बहुत लंबी है। 

कोहिनूर की कीमत का आज तक कोई सही-सही अंदाजा नहीं लगा पाया। जो हमेशा सुल्तानों की शान रहा। जिसे तिजोरी में बंद करने की ख्वाहिश में न जाने कितनी सल्तनतें उजड़ गईं। उसी कोहिनूर के एक दावेदार जबलपुर का ये चाय वाला भी हैं। इन्हें दुनिया स्टेनली जॉन लुईस के नाम से जानती है। इनका दावा है कि कोहिनूर भारत सरकार का नहीं, इनकी खानदारी संपत्ति है। पिछले 9 साल से ये बकायदा कोहिनूर हासिल करने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ रहे हैं।

कोहिनूर पाने के लिए जबलपुर के इस चाय वाले ने वकीलों की फौज खड़ी कर दी है। इनका दावा है कि कोहिनूर हीरा उनके परदादा एलबर्ट लुईस की धरोहर था, जिसे राजा-महाराजा अपने कब्जे में करने की तिकड़म भिड़ाते रहे। बाद में उनके खानदान की विरासत कोहिनूर हीरा को ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया। 

स्टेनली जॉन लुईस ने कोहिनूर पर दावा पेश करते हुए हाईकोर्ट में याचिका लगा रखी है। वो सुप्रीम कोर्ट से लेकर इंटरनेशनल कोर्ट तक जाने का इरादा रखते हैं। दूसरी ओर कोहिनूर के एक दावेदार महाराजा दलीप सिंह के भतीजे सुखदेव सिंह संधवालिया भी है। वो लंबे समय से अपनी विरासत पाने के लिए जंग कर रहे हैं।

सुखदेव सिंह संधवालिया का तर्क है कि कोहिनूर हीरा महाराजा दलीप सिंह से 1849 में जबरदस्ती ले लिया गया था। तब वो नाबालिग थे। बड़ा सवाल ये है कि जिस कोहिनूर को लाने के लिए इतना पसीना बहाया जा रहा है। कोई वकीलों की फौज खड़ी कर रहा है तो कोई ब्रिटेन चिट्ठी पर चिट्ठी लिख रहा है? लेकिन, दुनिया के सबसे चमकदार और कीमती पत्थर के उस शापित योग का क्या? जिसकी गवाही इतिहास के पन्ने देते हैं। जो कई सल्तनतों के उजड़ने की कहानी बयां कर रहा है।