केंद्र सरकार ने कहा, एएमयू नहीं माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन

नई दिल्‍ली (12 जनवरी): एनडीए सरकार के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सुप्रीम कोर्ट में लिये स्टैंड से बीजेपी पर लगे असहिष्णुता के आरोपों इस विवाद को फिर से हवा मिल सकती है। बीजेपी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन की कैटगरी में नहीं रखा जा सकता है।

अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने जस्टिस जेएस शेखर, जस्टिस एमवाई इकबाल और जस्टिस सी नगप्पन की बेंच को बताया कि यूनियन ऑफ इंडिया का ये स्टैंड है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी नहीं है। केन्द्र सरकार के तौर पर हम एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में एक माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन का गठन करते हुए नहीं दिखना चाहते।

मोहम्मडन ऐंग्लो ओरियंटल कॉलेज को विघटित कर साल 1920 में एएमयू एक्ट लागू किया गया था। संसद ने 1951 में एएमयू संशोधन एक्ट पारित किया और इसके दरवाजे गैर-मुसलमानों के लिए खोले गए। साल 1967 में सुप्रीमकोर्ट ने अजीज बाशा केस में कहा कि एएमयू माइनॉरिटी संस्थान नहीं है क्योंकि इसकी स्थापना संसद के बनाए कानून से हुई है, लेकिन विपक्ष के कई नेता केन्द्र के सुप्रीम कोर्ट में रखे गए रुख को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं।

साल 1981 में संसद ने एक संशोधन के जरिए एएमयू को एक तरह से माइनॉरिटी टैग लौटा दिया और उसे भारत में मुसलमानों की सांस्कृतिक और शैक्षणिक तरक्की तरक्की के लिए काम करने की इजाजत दे दी। साल 2004 में एएमयू ने पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सीटों का पचास फीसदी मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया।

इसी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने केंद्र सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया है कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। यूनिवर्सिटी के वाइस चासंलर लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरउद्दीन शाह ने कहा है कि संस्थान का अल्पसंख्यक चरित्र यूनिवर्सिटी के लिए जीने-मरने का सवाल है।