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देश को स्वस्थ रखने वाली 'गाड़ी' का सच जानकर खौल उठेगा आपका खून

नई दिल्ली (11 सितंबर): दुनिया के अलग-अलग देशों से आज हिंदुस्तान में लोग अपना इलाज कराने आते हैं। हेल्थ टूरिज्म के लिहाज़ से भी भारत दुनियाभर में मशहूर हो रहा है। लेकिन कितने अफसोस की बात है कि खुद हिंदुस्तानी एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तड़पते हैं। कहीं लोगों को वक्त पर एंबुलेंस नहीं मिल पाती तो कहीं मिल तो जाती है लेकिन उनमें बुनियादी सुविधाएं नहीं होतीं।

वक्त पर एंबुलेंस नहीं मिलने की वजह से लोगों की बेबसी की तस्वीरें कई बार देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ चुकी हैं। एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण कहीं बाइक पर मरीज को ले जाना पड़ा, तो कहीं लाश को कंधे पर ढोना पड़ा। समस्या एक-दो राज्यों तक सीमित नहीं है। देश के ज्यादातर हिस्सों में एंबुलेंस सेवा वेंटिलेटर पर है।

एक सामान्य एंबुलेंस की कीमत 5 लाख रुपए है। फिर भी देश में ऐसे सरकारी और निजी अस्पतालों की बड़ी संख्या है जिनमें एंबुलेंस की सुविधा नहीं है। अव्वल तो पर्याप्त एंबुलेंस है ही नहीं और जहां पर हैं वो या तो खटारा हैं या फिर अस्पताल में परिसर खड़ी धूल फांक रही हैं। जो एंबुलेंस सही सलामत हैं उनमें ऑक्सीजन सिलेंडर जैसी बुनियादी सुविधा तक नहीं। 

यूपी का हाल > यूपी में सरकारी और निजी कुल 5195 एंबुलेंस हैं। > सरकारी नियम के मुताबिक 80 हज़ार लोगों पर 1 एंबुलेंस होनी चाहिए। > यूपी में 1.16 लाख लोगों पर 1 सरकारी एबुलेंस है।

बिहार का हाल > सरकारी एंबुलेंस 798 > निजी एंबुलेंस 1 हज़ार से ज्यादा > सूबे को 1100 एंबुलेंस की ज़रुरत > सरकारी स्तर पर 302 एंबुलेंस की कमी > बिहार में कुल 100 एंबुलेंस की कमी

झारखंड का हाल  > सरकारी एंबुलेंस की संख्या 650  > सरकारी स्तर पर ज़रुरत से 329 कम > ज्यादातर एंबुलेंस सामान्य हैं > एंबुलेंस में केवल स्ट्रेचर और ऑक्सीजन सिलेंडर ही होते हैं।

महाराष्ट्र का हाल > महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों और 108 नंबर सेवा की कुल 4456 एंबुलेंस।  > सूबे में ज़रुरत से आधी एंबुलेंस ही हैं। > सरकार ने कुछ गांव और ज़िलों में एंबुलेंस बोट सेवा शुरू की है।

राजस्थान का हाल > 1418 सरकारी एंबुलेंस हैं > 5689 निजी एंबुलेंस हैं  > 2013 से अब तक एंबुलेंस में ही 1846 डिलीवरी हो चुकी हैं।

ऐसा नहीं है सरकारें हालात से वाकिफ नहीं है। लोगों को समय पर एंबुलेंस मुहैया कराने के लिए अलग-अलग राज्यों में कई कदम उठाए गए हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक में टू-व्हीलर एंबुलेंस शुरू की गईं। सूरत में लोगों ने ऑटो एंबुलेंस शुरू की। असम सरकार ने 2009 में मजूली जिले में स्वास्थ्य सेवा के लिए बोट एंबुलेंस शुरू की। केरल और महाराष्ट्र में भी बोट सेवा शुरू की गई है। लेकिन ये कोशिशें नाकाफी साबित हो रही हैं। तमाम सरकारी कवायद के बावजूद देश के 50 फीसदी  से ज्यादा लोगों को वक्त एंबुलेंस नहीं मिल पाती। कहीं मरीज एंबुलेंस के लिए तरसते रहते हैं। कहीं लाशों को ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिल पाती।


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