'धर्म को सरकार से अलग रखना चाहिए... सारे धर्म महिला-विरोधी'

नई दिल्ली (7 फरवरी): बांग्लादेशी लेखक तसलीमा नसरीन का मानना है कि भारत 'असहिष्णु' देश नहीं है। वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग एक दूसरे की आस्था के लिए काफी सहिष्णु हैं। भारत के कानून असहिष्णुता का समर्थन नहीं करते। लेकिन देश में कई असहिष्णु लोग हैं।"

निर्वासित लेखिका तसलीमा यह सब कोझीकोड में कह रही थीं। वह शनिवार को पहले केरल लिट्रेचर फेस्टिवल में शरीक होने आई हुई थीं। साल 2005 से वह पहली बार नई दिल्ली के बाहर किसी स्थान पर गई हैं।

अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, लेखक के सच्चिदानंदन की तरफ से पूछे गए एक सवाल के जवाब में तसलीमा ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि भारत में सेकुलर्स केवल हिंदू रूढ़िवादियों पर ही सवाल क्यों उठाते हैं? वे मुस्लिम रूढिवादियों को क्यों भूल जाते हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि छद्म-पंथ निरपेक्षता सच्चा लोकतंत्र कभी नहीं था। 

कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में वास्तविक विवाद रूढ़िवादियों और पंथ-निरपेक्षता में था। यह विवाद नए विचारों और परंपराओं के बीच था। यह मानवता और बर्बरता के बीच था। इसके अलावा यह विवाद आज़ादी में भरोसा रखने वालों और ना रखने वालों के बीच था। तसलीमा ने दादरी घटना की निंदा की और उन्होंने देश के बौद्धिक लोगों के अनोखे तरीके से विरोध जताने की तारीफ की।

एक लेखक के तौर पर और इस्लामी रूढ़िवादी के खिलाफ बांग्लादेश में अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए तसलीमा ने कहा कि सभी धर्म महिला-विरोधी हैं। हालांकि, रूढ़िवादियों ने विकृतता भी इसमें जोड़ दी। तसलीमा ने कहा, "आपको धर्म को सरकार से अलग रखना चाहिए। 21वीं सदी में सातवीं सदी के कानून का अभ्यास करने की जरूरत नहीं है।" उन्होंने बताया कि किस तरह कानून निर्माण में धर्म के प्रभाव ने बांग्लादेश में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय की महिलाओं के अत्याचार में भूमिका निभाई।