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अहोई अष्टमी का पुनर्वसु नक्षत्र के साथ बन रहा अत्यंत शुभ संयोग- देखें कैसे करें पूजा

यह व्रत संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। संतानवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। कहते हैं कि इसे करने से साल पर संतान पर कोई संकट नहीं आता है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे या चंद्रमा के दर्शन के बाद होई का पूजन करके व्रत खोलती हैं। तारों और चंद्रमा को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है।

न्यूज़ 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (20 अक्टूबर): अहोई अष्टमी का व्रत हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत करवाचौथ से चार दिन बाद और दिवाली से 8 दिन पहले मनाया जाता है। इस बार अहोई अष्टमी का पुनर्वसु नक्षत्र के साथ शुभ संयोग बन रहा है। दरअसल इस बार शाम 05 बजकर 32 मिनट तक पुनर्वसु नक्षत्र है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह बहुत सौभाग्यशाली संयोग माना जा रहा है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत के फल से हर इच्छा पूरी हो जाती है। इस दिन मां पार्वती की पूजा की जाती है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। संतानवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। कहते हैं कि इसे करने से साल पर संतान पर कोई संकट नहीं आता है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे या चंद्रमा के दर्शन के बाद होई का पूजन करके व्रत खोलती हैं। तारों और चंद्रमा को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है।

इस दिन गेरु से दीवार पर अहोई बनाई जाती है या फिर उसका कैलेंडर बना कर लगाया जाता है। कुछ लोग किसी मोटे वस्त्र पर अहोई काढकर दीवार पर लगा लेते हैं। ये व्रत दीपावली के आठ दिन पहले आैर करवाचौथ के चार दिन बाद मनाया जाता है। यह व्रत संतान की लम्बी आयु और सुखमय जीवन की कामना से महिलाएं करती हैं। कृर्तिक मास की अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में यह व्रत रखा जाता है इसीलिए इसे अहोई अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत से दीपावली पर्व का आरंभ भी माना जाता है।

अहोई के चित्र में आमतौर पर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। उत्तर भारत के अधिकांश इलाकों में अहोई माता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की अहोई बनवाती हैं। जमीन को गोबर से लीपकर कलश की स्थापना की जाती है। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। उसके बाद एक लकड़ी के पटरे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। इस बार पूजा का मुहूर्त 21 अक्‍टूबर को शाम 05 बजकर 42 मिनट से शाम 06 बजकर 59 मिनट तक यानी कुल 1 घंटे 17 मिनट तक रहेगा और तारों को देखने का समय: शाम 06 बजकर 10 मिनट है।

Images Courtesy:Google

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