तालिबानियों ने आंखों के सामने काट दिए थे रिश्तेदारों के सिर, बेटा बना सेना में अफसर

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (9 दिसंबर): अफगानिस्तान के जलालाबाद के रहने वाले मोरल वाहलीजादा की उम्र उस वक्त 16 साल रही होगी, जब वह सरकार और तालिबान के बीच पनप रही हिंसा और नफरत से अनजान थे। मगर एक दिन उनकी पूरी दुनिया ही जैसे उजड़ गई। तालिबान आतंकियों ने उनके शहर पर हमला किया और दर्जनों लोगों की हत्या कर दी, इनमें से कई मोरल के करीबी रिश्तेदार थे।  

ऑस्ट्रेलियन आर्मी के लिए कई दिनों तक बतौर अनुवादक काम करने वाले मोरल ने भारत आकर नैशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) का एग्जाम निकाला और फिर वहां से आईएमए पहुंचे। शनिवार को 21 साल की उम्र में उनका सपना सच हो गया और अब वह अफगानिस्तान आर्मी में बतौर अफसर काम करेंगे।मोरल ने उस हमले के बारे में बताया, 'वह हमला आतंकियों का शक्ति प्रदर्शन था। मैं पूरी तरह हैरान था और सदमे में चला गया था। कई दिनों तक मैंने किसी से कोई बात नहीं की थी। निर्दोषों का खून बहते देखने के बाद मैंने सेना में जाने का फैसला किया।'अपने मां-बाप की इकलौती संतान वहलीजादा ने बताया कि मेरे आर्मी में जाने के फैसले का घरवालों ने कड़ा विरोध किया, मगर मैं अडिग रहा। उन्होंने कहा, 'बेकसूर महिलाओं और बच्चों की चीखें आज भी मेरे कानों में गूंजती है और यही मुझे तालिबान से लड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे और भी युवा सेना में आएं और तालिबान के खिलाफ इस जंग को लड़ें।'वहलीजादा के साथ 48 अन्य अफगान जेंटलमैन कैडट्स आईएमए की पासिंग आउट परेड के बाद अफगान नैशनल आर्मी में कमिशन हुए। अफगानिस्तान के अलावा भूटान के 15 कैडट्स, मालदीव के 5 कैडट्स और नेपाल, ताजिकिस्तान, वियतनाम और श्रीलंका के 2-2 कैडट्स पासआउट हुए।