जम्मू-कश्मीर के झंडे को लेकर हाईकोर्ट ने पूर्व आदेश को निलंबित किया

नई दिल्ली (1 जनवरी): जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की बड़ी बेंच ने उस आदेश को निलंबित कर दिया है, जिसके तहत कोर्ट ने आदेश दिया था कि सरकारी संपत्तियों पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ राज्य का झंडा होना जरूरी है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, 27 दिसंबर को जम्मू-कश्मीर की हाईकोर्ट की एक बेंच ने आदेश पारित किया था। इस आदेश को जम्मू कश्मीर की 'स्वायत्तता की पुनर्स्थापना' माना जा रहा था। आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य के सभी संवैधानिक प्राधिकारियों को जम्मू कश्मीर संविधान की धारा 44 के तहत अनिवार्य व्यवस्था का पालन करने के लिए कहा है। इसमें कहा गया कि राज्य की सभी सरकारी संपत्तियों यानी सरकारी वाहन और कार्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज के साथ राज्य के ध्वज का प्रयोग किया जाना चाहिए।

गौरतलब है, हाईकोर्ट के पहले के आदेश को बीजेपी ने चुनौती दी थी। बीजेपी फिलहाल राज्य में सत्ताधारी गठबंधन की एक पार्टी है। पीडीपी के साथ मिलकर बीजेपी साझा सरकार चला रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी में चुनाव में जीत के बाद शपथग्रहण समारोह में शिरकत की थी। जहां पर दोनों ध्वजों का प्रयोग किया गया था।

जम्मू कश्मीर ही एक मात्र राज्य जिसे है राज्य का झंडा रखने का अधिकार 

बता दें, देश में जम्मू-कश्मीर ही एक मात्र राज्य है, जिसे राष्ट्रीय ध्वज के साथ अपना निजी झंडा रखने और प्रयोग में लाने की इजाजत है। इस प्रकार का आदेश देने वाले जज ने कहा था कि उनका आदेश संविधान के अनुच्छेद 370 पर आधारित था। इस अनुच्छेद के तहत राज्य को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। जिसके तहत वह कुछ बातों को छोड़कर अपना कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है। जज ने अपने आदेश में कहा कि राज्य के ध्वज का वैसा ही सम्मान और स्तर है, जैसा कि राष्ट्रीय ध्वज का है। इसलिए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय ध्वज के समान इसकी पवित्रता और सम्मान को हर कीमत पर बरकरार रखा जाए।

रिपोर्ट के मुताबिक, क्योंकि राज्य को धारा 370 के तहत विशेष दर्जा प्राप्त है, इसका इस्तेमाल करते हुए राज्य का संविधान कहता है, कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ राज्य का ध्वज भी लगाया जाना चाहिए। मार्च में ही सरकार ने यह आदेश दिया था कि दोनों ध्वजों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस आदेश के बाद सत्ताधारी दलों में मतभेद पैदा हो गए। बीजेपी के विरोध के बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया। इस समय यह कहा गया कि जब संविधान में इसकी इजाजत है, तब ऐसे आदेश को जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।