मायावती के गले की फांस बना उनका यह फैसला

अशोक तिवारी, लखनऊ (18 मई): यूपी में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं, लेकिन मायावती दो साल पहले ही अपने टिकट लगभग फाइनल कर चुकी हैं। हालांकि अब मायावती के लिए वही फैसला गले की फांस बनने लगा है। इसीलिए मायावती ने बीस मई को दिल्ली में अपने सिपहसालारों की बैठक बुलाई है। 

दरअसल मायावती को अब लगने लगा है कि टिकट बंटवारे में जो जातियों का फॉर्मूला उन्होंने आजमाया है, वो अब अटक रहा है। वजह है दलितों को लेकर बीजेपी का डोरा डालना। ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस का हाथ मारना। मुस्लिमों के बीच मुलायम का अपना दांव मजबूत करना। इसलिए मायावती अब दोबारा टिकट बंटवारे का आंकलन करने जा रही हैं। प्लान ये बना है कि अखिलेश सरकार को घेरने के लिए मायावती राज की याद जनता को दिलाई जाए, ताकि अपने माहौल के मुताबिक टैम्पो हाई हो सके। 

यूपी में जिस तरह नीतीश कुमार और बाकी छोटी पार्टियां पैर पसार रही हैं। समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से बेनी प्रसाद वर्मा की घर वापसी कराई है। बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को अध्यक्ष बनाकर जिस तरह पिछड़ा कार्ड खेला है। उससे मायावती को सबसे ज्यादा घबराहट होनी लाजमी है। यही वजह है कि मायावती अपने उन उम्मीदवारों का इलाके में फीडबैक पता करने लगी हैं, जिन्हें पहले टिकट दिया जा चुका है। 

मायावती अपनी रणनीति टटोली रही हैं, लेकिन उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को शायद लगने लगा है कि बहिन जी की वापसी तय है। मायावती ये कह चुकी हैं कि वो अब जीतीं तो यूपी में मूर्तियां नहीं लगवाएंगीं, लेकिन नेता, कार्यकर्ता कुछ और ही ख्वाब बुन रहे हैं। यूपी में बीएसपी नेता मायावती की मूर्तियां बनवाने का ऑर्डर दे रहे हैं। मायावती के मूर्तिकार प्रजापति बंधुओं के पास अब तक 200 मूर्तियों के तो ऑर्डर भी आ चुके हैं। 

यूपी में सियासत की नब्ज पकड़ने वाले कहते हैं कि बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों जानते हैं कि अखिलेश सरकार से ज्यादा लड़ाई मायावती से लड़नी पड़ेगी। जो लोकसभा चुनाव में एक भी सीट ना मिलने के बाद यूपी के चुनावों में सारा बदला लेने की रणनीति बनाने में जुटी हैं। अब मायावती 20 मई को जब दिल्ली में अपने सेनापतियों के साथ मंथन करेंगी तो इस बात पर ही सबसे ज्यादा चर्चा होगी कि कैसे सूबे के बदले हुए सियासी समीकरणों में अपनी चालें दोबारा से तय की जाएं। ताकि 2014 जैसी गलती 2017 में ना हो।