एक नज़र में जानिए- राष्ट्रीय IPR नीति

पूर्वशा मंशारमानी, नई दिल्ली (4 जून) :  ‘इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी/बौद्धिक सम्पत्ति (IP)’  मस्तिष्क से उपजी रचनाओं, अविष्कारों को कहा जाता है। वाणिज्यिक गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाली साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं के साथ ही चिह्नों (सिम्बल्स), नामों और तस्वीरों को भी इसमें शामिल किया जाता है।

आज की तारीख में व्यापारों में कई तरह के बदलाव आ रहे हैं। साथ ही इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी का क्षेत्र भी लगातार प्रगति कर रहा है। इन बातों पर गौर करते हुए महसूस किया गया कि वर्तमान ‘इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR)’ व्यवस्था के कुछ पहलुओं में बदलावों की जरूरत है। जिससे यह वर्तमान की चुनौतियों का सामना कर सके। इसके अलावा इसपर भी ध्यान दिया गया कि भारत को WTO का सदस्य होने के नाते TRIPs के साथ नरम होना होगा, इसके लिए हमें अपने कानूनों को अपडेट करने के साथ ही और न्यायसंगत बनाना होगा। इस नजरिए से भारत सरकार ने नेशनल IPR पॉलिसी लाने का फैसला किया।

यह पॉलिसी हर क्षेत्र में IPR की अहमियत को समझाने की कोशिश करती है। साथ ही स्टेकहोल्डर्स की समस्याओं को निपटाने के लिए मौजूदा साहित्य/कानूनों में बदलावों की भी जरूरतों का जिक्र करती है।

इस पॉलिसी के कुछ खास बातें और उद्देश्य नीचे विस्तार से बताए जा रहे हैं-

1. IPR को लेकर जागरुकता

जैसा कि देखा गया, कि समाज का ज्यादातर हिस्सा IPR के अस्तित्व और फायदों के बारे में जानता ही नहीं था। इस मकसद से, पॉलिसी समाज के हर क्षेत्र में इसको लेकर जागरुकता फैलाना चाहती है। जिसमें ग्रामीण और शहरी जनसंख्या शामिल है। इसमें यह भी है कि इसे देश के संस्थानों में अनिवार्य रूप से हिस्सा बनाया जाए।

2. IPRs का विकास

भारत में व्यापक टैलेंट पूल को ध्यान में रखकर इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसी कथन के आधार पर IPR पॉलिसी आविष्कारों और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। खासकर, जब ज्यादातर कम्पनियां MSMEs से आती हों या स्टार्ट-अप हों। यह अहम हो जाता है कि ना केवल इन कम्पनियों के अधिकारों/रचनाओं को सुरक्षित किया जाए। बल्कि साथ ही उन्हें आगे रचनात्मकता के लिए बढ़ावा दिया जाए।

3. कानूनी और विधायी ढ़ांचा

दुनिया में मौजूद प्रतियोगिता को देखते हुए यह समय की जरूरत है कि इस आधार पर भारत के हितों को सुरक्षित किया जाए। इसीलिए, पॉलिसी मौजूदा कानूनों को मजबूत बनाना चाहती है और एक असरदार कानूनी व्यवस्था प्रदान करती है, जिससे IPRs की सुरक्षा की जा सके और इन्हें बढ़ावा दिया जाए।

4. प्रशासन और प्रबंधन

पॉलिसी IPRs को दायर करने और मंजूरी मिलने की जटिल प्रक्रिया को बदलना चाहती है। यह चाहती है कि असरदार IPR व्यवस्था के लिए कानूनों को आधुनिक बनाया जाए। इसे पाने के लिए यह लंबित पेटेंट एप्लीकेशन्स के लिए औसत समय को 5-7 साल से कम कर 18 महीने करना चाहती है। इसके अलावा ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन के लिए समयावधि को 13 महीने से घटाकर एक महीने करना चाहती है। अहम प्रशासनिक बदलाव के तहत कॉपीराइट एक्ट (1957), सेमीकंडक्टर इंटीग्रेटेड सर्किट्स लेआउट-डिजाइन एक्ट (2000) के प्रशासन को DIPP के भीतर लाना है। इसके अलावा IPR प्रचार और प्रबंधन सेल (CIPAM) बनाना शामिल है।

5. IPR का व्यवसायीकरण

पॉलिसी इन अधिकारों के मालिको के लाभ के लिए कोशिश करती है। साथ ही इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी की अहमियत पर जोर देती है। इसके अलावा पॉलिसी इसके प्रचार और मार्केटिंग का आकलन भी करती है। यह एक प्लेटफॉर्म बनाने का प्रस्ताव करती है, जहां निर्माता, आविष्कारक- सक्षम खरीददारों, उपभोक्ताओं और फंडिंग देने वाले संस्थानों से मिल सकें।

6. न्यायिक फैसले और अमल

ऐसा महसूस किया गया कि इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के उल्लंघन करने पर न्यायिक फैसले करने और उसे अमल में लाने वाली व्यवस्थाओं की कमी है। इसके लिए पॉलिसी IPR धारकों के लिए कानूनी सुधारों को सुनिश्चित करना चाहती है। जो उल्लंघन के मामलों के संबंध में अपने अधिकारों को अमल में लाना चाहते हैं।

7. मानव पूंजी विकास (ह्यूमन कैपिटल डेवलेपमेंट)

आर्थिक वृद्धि के लिए उनके इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी अधिकारों की क्षमता बढ़ाने के लिए जरूरत महसूस की गई कि आईपी एसेट्स के दायरे को बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाए। जो तभी किया जा सकता है जब मौजूदा मानव संसाधन और IPR से जुड़ी संस्थाओं का विस्तार किया जाए। साथ ही उन्हें मजबूत भी किया जाए।

निष्कर्ष : 

हालांकि, पॉलिसी इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी के क्षेत्र का व्यवसायीकरण और विस्तार कर इसका प्रचार और विकास करना चाहती है। लेकिन यह खास बातों का जवाब नहीं देती। यह देश में पेटेंट फाइलिंग की मौजूदा हालत पर रौशनी नहीं डालती, ना ही यह बताती है कि इसे कैसे सुधारा जा सकता है। यह भी जिक्र नहीं है कि ज्यादातर पेटेंट्स देश में विदेशी कम्पनियों और निवेशकों की तरफ से दायर किए जाते हैं। पॉलिसी छोटे दर्जे के पेटेंट्स और यूटिलिटी मॉडल्स की IP के प्रकार के तौर पर पहचाने जाने के लिए प्रस्ताव करती है। जिससे छोटे आविष्कारों की सुरक्षा को आसान बनाया जा सके।

पॉलिसी IP पहलुओं और नियमन और प्रशासनिक बदलावों के दायरे को बड़ा करने के लिए मौजूदा व्यवस्था में कई बदलावों का सुझाव देती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आधुनिक होने, अंतर्राष्ट्रीय संधियों (अनुबंध और समझौतों) की प्रकृति में हो रहे बदलावों के मद्देनज़र कानूनों में तेजी लाने की जरूरत है। इसके लिए पॉलिसी सुझाव देती है कि हमें अपने कानूनों में सुधार/संशोधन लाने की जरूरत है। साथ ही यह भी ध्यान रखना है कि IP सुरक्षा देने के मकसद के दो पहलू हैं। पहला आविष्कारक/निर्माता का लाभ और उपभोक्ता को मिलने वाला लाभ, और ये दोनों ही साथ-साथ होने हैं।

पॉलिसी आगे कहती है कि IPOs को और शक्तियां देने की जरूरत है। इसके लिए जिस प्रक्रिया को अमल में लाना है उसका एक मानक (स्टैंडर्ड) तैयार करने की जरूरत है। साथ ही विभिन्न IPOs के बीच समन्वय भी बेहद जरूरी है। इसके अलावा हमें कई दूसरे कानूनों और IP के बीच के संबंध और आंतरिक बारीकियों का अध्ययन और विश्लेषण करने की जरूरत है। जिससे IP तैयार करने से संबंधित सभी पहलुओं को छुआ जाए। या और ऐसा कुछ जो इसे उपलब्ध कराने में मंजूरी के बीच परेशानी बनकर खड़ा हो जाए, जैसे कम्पटीशन लॉ के मुद्दे।

IPR पॉलिसी एक स्वागतयोग्य बदलाव मानी जा रही है। लेकिन सब इस बात पर निर्भर करता है कि इसे लागू कैसे किया जाता है। अगर पॉलिसी में जिन पहलुओं का जिक्र किया गया है, उन सभी को सख्त तरीके से लागू किया जाए, तो यह पॉलिसी दुनिया में भारत की एक अलग जगह बनाएगी। इसके लिए स्वदेशी आविष्कारकों के अधिकारों और हितों को ध्यान में रखना होगा। जो फिर नई खोजों को काफी बढ़ावा देगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं। लेखक एसोसिएट टीएमटी लॉ प्रैक्टिस हैं)