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'राफेल के ऑफिस में जासूसी, दस्तावेज उड़ाने की कोशिश'

राफेल के ऑफिस में कुछ अज्ञात लोगों ने तो़ड़फोड़ की है। लोगों का तोड़फोड़ करने का मकसद इस कार्यालय से सिर्फ डेटा चोरी करना था। जिस जगह पर इस कार्यालय में तोड़फोड़ की गई वो फ्रांस के सुबरब में स्थित है।

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली(22 मई): राफेल के ऑफिस में कुछ अज्ञात लोगों ने तो़ड़फोड़ की है। लोगों का तोड़फोड़ करने का मकसद इस कार्यालय से सिर्फ डेटा चोरी करना था। जिस जगह पर इस कार्यालय में तोड़फोड़ की गई वो फ्रांस के सुबरब में स्थित है। फ्रांस के एक उपनगर में भारतीय वायु सेना राफेल प्रोजेक्ट मैनेजमेंट टीम का कार्यालय है।

 इसी कार्यालय में तोड़-फोड़ की कोशिश की गई है। यह घटना रविवार की रात को हुई। घटना को अंजाम देने वालों का उद्देश्य संभवतः भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण डेटा चोरी करना था। मगर वो उसमें कामयाब नहीं हो पाया। विशेष रूप से, एक ग्रुप कैप्टन रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में एक भारतीय टीम 36 राफेल लड़ाकू जेट के उत्पादन की देखरेख करने के लिए फ्रांस में है, जिसे भारत डसॉल्ट एविएशन से खरीद रहा है और वहां भारतीय कर्मियों के प्रशिक्षण के लिए भी।

दिल्ली में रक्षा मंत्रालय को भारतीय वायु सेना के कर्मियों द्वारा घटना के बारे में पहले ही जानकारी दे दी गई है। भारतीय वायु सेना राफेल परियोजना प्रबंधन टीम कार्यालय में एक विराम था जो फ्रांस में पेरिस के एक उपनगर में स्थित है। कोई हार्ड डिस्क या दस्तावेज नहीं चुराया जा सका है। इसके बारे में अभी अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हुई है।

राफेल टीम कथित तौर पर पेरिस के सेंट क्लाउड उपनगर में बैठती है और पुलिस अधिकारी कथित रूप से इस मामले की जांच कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ब्रेक-इन का उद्देश्य डेटा चोरी करना हो सकता है, क्योंकि प्रशासनिक कार्यालयों में पैसे या कीमती सामान नहीं रखे जाते हैं।

उधर दिल्ली में राफेल मुद्दे को लेकर प्रशांत भूषण और अन्य याचिकाकर्ताओं ने लिखित में तथ्य जमा किए। बता दें कि राफेल मामले में 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ प्रशांत भूषण समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

बता दें कि 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील मामले में तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इन याचिकाओं में फ्रांस से 36 जेट विमानों की खरीद प्रक्रिया और इंडियन ऑफसेट पार्टनर के चुनाव में मोदी सरकार द्वारा भारतीय कंपनी का फेवर किए जाने के आरोपों की जांच करने की मांग की गई थी।

कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि खरीद में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह का कोई कारण नहीं बनता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मामले में किसी निजी संस्था को फायदा पहुंचाया गया। कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ प्रशांत भूषण समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने रिव्यू पेटीशन दायर की थी।


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