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विज्ञापन बंद न कर दे सरकार इसिलए मीडिया ने जुबान पर ताला और आंखों पर पट्टी डाली

पाकिस्तान में निजाम बदला है लेकिन सरकार और सेना का रवैया जस का तस है। सरकार और सेना के खिलाफ लिखने और बोलने वालों को आतंकियों की तरह सिक्योरिटी एजेंसियां उठा कर ले जाती हैं, और उन्हें तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक वो सार्वजनिक तौर पर अपनी गलती मानकर माफीं नहीं मांग लेता। हाल ही घटना लाहौर के निजी टीवी चैनल के पत्रकार रिजवान राजी के साथ घटित हुई है।

न्यूज 24 ब्यूरो, लाहौर (9 फरवरी): पाकिस्तान में निजाम बदला है लेकिन सरकार और सेना का रवैया जस का तस है। सरकार और सेना के खिलाफ लिखने और बोलने वालों को आतंकियों की तरह सिक्योरिटी एजेंसियां उठा कर ले जाती हैं, और उन्हें तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक वो सार्वजनिक तौर पर अपनी गलती मानकर माफीं नहीं मांग लेता। हाल ही घटना लाहौर के निजी टीवी चैनल के पत्रकार रिजवान राजी के साथ घटित हुई है। रिजवान के बेटे ओसामा ने बताया कि शनिवार को काले रंग की होंडा सिविक कार में पुलिस के कुछ लोग आये और उसके पिता को जबरन घसीटते और पीटते हुए कार में डाल कर ले गये। 

ओसामा ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि उसके पिता ने सोशल मीडिया पर सरकार और खुफिया एजेंसियों की काली करतूतों पर टिप्पणी लिखी थी। उनपर उन टिप्पणियों को डिलीट करने और माफी मांगने का दबाव डाला जा रहा था। ओसामा के बयान को पुष्ट करते हुए लाहौर के एक खुफिया अधिकारी ने बताया कि रिजवान से पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसियां पिछले कुछ दिनों से लगातार पूछताछ कर रही थीं हो सकता है उन्होंने ही रिजवान को गिरफ्तार किया हो। हालांकि अधिकारिक तौर पर अभी तक रिजवान की गिरफ्तारी की कोई खबर नहीं है और न ही यह पता चल पाया है कि रिजवान कहां और किस हालत में है। पाकिस्तान में रिजवान के साथ इस तरह के रवैये के खिलाफ उसके परिजनों ने अपने घर के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया। 

रिजवान को आतंकियों की तरह पकड़ कर ले जाने की घटना को प्रकाश में लाने वाली एजेंसी को कुछ स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि इमरान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान में मीडिया पर प्रतिबंध और अधिक बढ़ गये हैं। सरकार-सेना और अदालतों के खिलाफ लिखना और बोलना खतरनाक हो गया है। पाकिस्तानी सेना मीडिया को सीधे निर्देश देने लगी है। जो मीडिया हाउस सेना या सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं उनके विज्ञापन बंद कर दिये जाते हैं। इनकम का बड़ा स्रोत बंद हो जाने के डर से टीवी चैनल और अखबारों ने सरकार के खिलाफ खबरें लिखना और दिखाना बंद कर दिया है। हालांकि, इन आरोपों को सरकार के प्रवक्ता ने गलत बताया है और कहा है कि सरकार और सेना मीडिया के कामकाज में दखल नहीं दे रही है। ऐसा नहीं कि पाकिस्तानी सेना और सरकार का दमन चक्र मीडिया के साथ-साथ शिक्षाविद और बुद्धिजीवियों के खिलाफ भी चलरहा है। शनिवार को ही

अम्मार अली जान नाम के एक शिक्षक को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्यों कि वो पश्तून तहाफ्फुज मूवमेंट के एक विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गये थे। पश्तूनों का यह प्रदर्शन अपने नेता अरमान लोनी की हत्या के विरोध में था। अम्मार अली जान अदालत ने इस शर्त पर छोड़ा कि वो लिख कर दे कि लोगों के भड़काने पर वो प्रदर्शन में शामिल हो गया था और आगे से वो पाकिस्तानी होने के नाते सरकार या सेना के किसी कदम का विरोध नहीं करेगा। ध्यान रहे, बलूचास्तानियों की तरह पश्तून भी पाकिस्तान से आजादी की मांग उठा रहे हैं। इसलिए पशतूनों की किसी भी गतिविधि में शामिल होने वाले के साथ पाकिस्तानी सेना और सरकार अलगाववादियों की तरह व्यवहार कर रही है।  


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