कल, आज और कल: 2018 में 2008 का पाठ

दीप उपाध्याय (मैनेजिंग एडिटर, न्यूज 24) नई दिल्ली (6 अक्टूबर): क्या मेरा पैसा सुरक्षित है? क्या म्यूचुअल फंड, शेयर और बाजार के हिसाब से चलने वाले मेरे दूसरे इनवेस्टमेंट डूब तो नहीं जाएंगे? क्या आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ेगी? कहीं कंपनियां नौकरियां कम तो नहीं करेंगी? रुपये की हालत, तेल की महंगाई, बाजार का लुढ़कना और IL&FS जैसी कंपनी के दिवालिया होने की खबरों से ये सब आशंकाएं जन्म ले रही हैं। सरकार कहती है कि इन सारी समस्याओं की जड़ विदेश में है। बाहरी कारणों से घरेलू अर्थव्यवस्था दबाव में है। सरकार के इस दलील में कुछ गलत भी नहीं है। डॉलर दुनिया की हर करंसी के मुकाबले मजबूत हुआ है, तेल की कीमतें पूरी दुनिया में बढ़ी है। इन दोनों कारणों से देश के खजाना कम हो रहा है। बाजार लड़खड़ा रहा है। हां, IL&FS जैसी कंपनी के दीवालिया होने के विशुद्ध घरेलू कारण हैं, बैंको पर पढ़ रहे कर्ज के बोझ की जड़ भी हिंदुस्तान में ही है, प्रॉपर्टी बाजार और नौकरियों की कमी का कारण भी घर में ही है।आज से 10 साल पहले देश में इससे भी बदतर हालात थे औऱ समस्या की सारी जड़ विदेश में थी। लेकिन अगर उस वक्त उस समस्या को ठीक से सुलझाया नहीं जाता तो आज देश की हालत बहुत खराब होती। सितंबर 2008 की बात है जब अमेरिका में लेहमैन ब्रदर्स नाम का इनवेस्टर बैंक डूब गया। पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया। हमारा शेयर बाज़ार 10 हजार के भी नीचे चला गया। लगा जैसे भारत में भी बड़े-बड़े बैंक डूब जाएंगे। रातों-रात विदेशी निवेशकों ने भारत से पैसा निकालना शुरू कर दिया। 2008 के इन्ही महीनों में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 12 अरब ड़ालर निकाल चुके थे।मौजूदा हालात इतने खराब नहीं हैं। रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर है, तेल महंगाई के रिकॉर्ड तोड़ चुका है, सरकार को अपने टैक्स कम कर के जनता के जले पर मरहम लगाना पड़ रहा है, तेल कंपनियों को अपने मुनाफे पर लगाम लगानी पड़ रही है, लेकिन देश में वैसी आर्थिक अफरातफरी नहीं है जैसी 2008 में थी। तब हर पल किसी बड़ी आर्थिक अनहोनी का डर तो था ही सुरक्षा के हालात भी बिगड़ रहे थे। 26 नवंबर 2008 को तो पाकिस्तानी आतंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी मंबई पर ही हमला कर दिया। तो फिर उस समय ऐसा क्या हुआ कि भारत सदी के उस सबसे मुश्किल आर्थिक संकट से ना सिर्फ बाहर निकला दुनिया की दूसरी सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था भी बना औऱ देश की जनता ने तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इसी कुशलता को देखते हुए उन्हें 2009 का चुनाव भी जिता दिया।अर्थजगत की कहानियां अक्सर बोरिंग होती हैं। लेकिन 2008 के हिंदुस्तान की कहानी में जबरदस्त थ्रिल है। हो सकता है आज से 10 साल बाद जब 2018 की कहानी लिखी जाए तो वो भी रोमांच से भरपूर होगी, लेकिन आज हमें नहीं पता है कि मौजूदा आर्थिक संकट को टालने के लिए राजनीतिक नेतृत्व औऱ नौकरशाही अंदरखाने क्या-क्या कोशिशें कर रही है। 2008 की बात करें तो उस समय हर स्तर पर चुनौतियां थी। जब अमेरिका का लेहमैन ब्रदर्स बैंक चिरनिंद्रा की तरफ जा रहा था तब देश की अर्थव्यवस्था चलाने वाले अधिकारी या तो रियाटर हो रहे थे या रिटायर होने वाले थे। 15 सितंबर 2008 को अशोक चावला आर्थिक मामलों के सचिव नियुक्त हुए, उसी दिन लेहमैन बैंक के डूबने की खबर आई थी। एक हफ्ते पहले ही अरुण रामनाथन को वित्त सचिव बनाया गया था। सितंबर के आखिर तक देश को नए आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव मिल गए। कहावत सही है सिर मुढ़ाते ही ओले पड़ गए। देश की अर्थव्यवस्था के लिए जिम्मेदार तीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारियों को पहले दिन से ही ऐसी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा, जिसका स्रोत सात समंदर पार अमेरिका में था।देश को संकट से उबारने की जिम्मेदारी सीधे-सीधे तीन लोगों के कंधे पर थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम औऱ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोनटेक सिंह आहलूवालिया। तीनों अर्थव्यस्था के जानकार थे। लेकिन इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण रोल पी चिदंबरम का हो गया था। उन्हें ही प्रधानमंत्री की सहमति से लिए गए हर फैसले को लागू करवाना था। कहते हैं चिदंबरम किसी भी काम को करवाने के माहिर हैं। उस वक्त रिजर्व बैंक अपने तौर-तरीकों में काफी सख्त थे। आरबीआई से कोई काम करवाना आसान नहीं था। लेकिन उस समय चिदंबरम ने रिजर्व बैंक से वो काम करवाया, जिससे भारतीय बाजार को जिंदा रखा जा सके। बाजार से पैसा निकला रहा था। तब चिदंबरम और आहलूवालिया ने मिलकर आरबीआई को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि बैंकों में पैसे की कमी नहीं होने दी जाएगी। 10 अक्टूबर को सीआरआर कम कर दिया गया। यानी अब बैंकों को रिजर्व बैंक में पहले के मुकाबले कम रकम रखने की जरूरत थी। बाजार में थोड़ा विश्वास लौटा। लेकिन म्यूचुअल फंड के ग्राहक घबराए हुए थे। लग रहा था म्यूचुअल फंड्स का महल कभी भी ढह सकता है। उस वक्त राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर एक बात बिल्कुल साफ कर दी गयी थी कि एक भी म्यूचुअल फंड को डूबने नहीं दिया जाएगा। अगर उस वक्त जनता की गाढ़ी कमाई वाला एक भी म्यूचुअल फंड डूब जाता तो देश का आर्थिक माहौल इतना खराब हो जाता कि संकट से निकलने का रास्ता नहीं मिलता। कहते हैं 14 अक्टूबर 2010 को चिदंबरम के कहने पर सेबी प्रमुख सीबी भावे और यूटीआई म्यूचुअल फंड के एमडी यूके सिन्हा मुंबई में आरबीआई के दफ्तर पहुंच गए। बैंक के गवर्नर सुब्बाराव अमेरिका में थे। डिप्टी गवर्नर्स के साथ दोनों की बातचीत हुई औऱ सुबह बाजार खुलने से पहले ही आरबीआई ने म्यूचुअल फंड्स के लिए विशेष फंडिंग फेसिलिटी का एलान कर दिया।एक तरफ जनता के निवेश को बचाने की कोशिश हो रही थी तो दूसरी तरफ प्राइवेट बैंकों पर मंडरा रहे संकट के बादलों को हटाना था। 2008 की शुरुआत में आईसीआईसीआई बैंक का शेयर ₹1200 से ऊपर था जो अक्टूबर आते-आते ₹364 रुपए पर पहुंच गया। बाजार में अफवाह उड़ गयी कि बैंक डूब रहा है। कहते हैं उस वक्त वित्त मंत्री के कहने पर बैंक के चेयरमैन एमवी कामथ मीडिया के जरिए ग्राहकों तक पहुंचे औऱ समझाया कि सबकुछ ठीक है। साथ ही सरकार की तरफ से वो सारे कदम उठाए गए जिससे बैंक की साख बची रहे। अगर एक भी प्राइवेट बैंक 2008 की आंधी में ढह जाता तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल होता ये कोई भी समझ सकता है।अगर उस वक्त सरकारी बाबूगीरी अर्थव्यवस्था पर हावी होती तो शायद संकट से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता। राजनीतिक नेतृत्व और अफसरों ने एक टीम की तरह काम किया, निजी क्षेत्र की वित्तीय संस्थाओं को बचाने की पूरी कोशिश हुई और बाजार के भरोसे को जिंदा रखने की हरमुमकिन कोशिश हुई। यही वजहें थी कि उस अफरातफरी में भी देश की आर्थिक साख बची रही। 2008 के मुकाबले 2018 का संकट कुछ भी नहीं है। संख्या के हिसाब से 2008 के मुकाबले 2018 की सरकार काफी मजबूत है। बस फर्क इतना है कि 2008 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ऊपर 2009 के चुनाव का उतना भार नहीं था जितना कि आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर है। तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक प्रधानमंत्री से ज्यादा एक व्यवहारिक अर्थशास्त्री का किरदार निभाया था। जिसने भारत ही नहीं दूसरे देशों को भी संकट से निकलने में मदद की। यही वजह है कि पिछले साल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दुनिया को बताया कि जब वो 2008 के संकट से उबरने के लिए काम कर रहे थे तब मनमोहन सिंह उनके ‘प्राइमरी पार्टनर ’ थे। 2018 की राजनीति में 2008 की केस स्टडी को सभी राजनीतिक दलों को समझना चाहिए। 2008 का उदाहरण देकर हम ये कह सकते हैं कि एक अच्छे अर्थशास्त्र से भी राजनीतिक जंग जीती जा सकती है।