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अयोध्या प्रकरणः 4 नवम्बर के बाद और 17 नवम्बर से पहले आ सकता है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा या पहले की तरह इस बार भी राम भक्तों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी इस बात का फैसला 4 नवम्बर के बाद और 17 नवम्बर से पहले किसी भी दिन आने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने बुधवार को ऐतिहासिक अयोध्या जमीन विवाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। उम्मीद की जा रही है कि सीजेआई के रिटायरमेंट से पहले फैसला आ जायेगा।

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (16 अक्टूबर): अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा या पहले की तरह इस बार भी राम भक्तों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी इस बात का फैसला 4 नवम्बर के बाद और 17 नवम्बर से पहले किसी भी दिन आने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने बुधवार को ऐतिहासिक अयोध्या जमीन विवाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने 40 दिनों तक केस की मैराथन सुनवाई की। उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में 17 नवंबर से पहले ही फैसला आ सकता है क्योंकि सीजेआई गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद मीडिया से बातचीत में हिंदू महासभा के वकील वरुण सिन्हा ने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है और स्पष्ट किया है कि इस मामले में 23 दिनों के भीतर फैसला आएगा।'

केशवानंद भारती केस के बाद अयोध्या जमीन विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे ज्यादा दिनों तक सुनवाई वाला मामला है। केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट में 68 दिनों तक सुनवाई हुई थी, जबकि अयोध्या मामले में 40 दिनों तक सुनवाई हुई। तीसरे नंबर पर आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं हैं, जिन पर 38 दिनों तक सुनवाई हुई थी।

अयोध्या जमीन विवाद में मामले की सुनवाई करने वाली संवैधानिक बेंच में सीजेआई गोगोई के अलावा 4 अन्य जज हैं- जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में मध्यस्थता के लिए जस्टिस (रिटायर्ड) एफएम कलीफुल्लाह की अगुआई वाले 3 सदस्यीय मध्यस्थता पैनल का गठन किया था। मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त से डे-टु-डे यानी दैनिक आधार पर सुनवाई (सप्ताह में 5 दिन) शुरू की।

सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ 14 याचिकाएं दाखिल हुई थी, जिन पर अब फैसले का इंतजार है। हाई कोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने मई 2011 में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के साथ विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

Images Courtesy:Google

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