न्याय के लिए भटक रही है 500 करोड़ की मालकिन

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न्यूज 24 ब्यूरो, नरेंद्र पुरी, नागपुर (15 दिसंबर): नागपुर की रहने वाली रजनी देवी अग्रवाल प्लास्टो कंपनी की असली मालिक है। उनके पति तथा उनकी प्लास्टो कंपनी में 66% की हिस्सेदारी थी।पति की तबीयत अचानक खराब होने के बाद वह अपने व्यवसाय पर ध्यान न दे पाई और इसी बात का फायदा उठाकर 33% के साझेदार रमेश चंद्र अग्रवाल ने समूची कंपनी पर कब्जा कर लिया। इस षड्यंत्र में धोखे से कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी करवा लिए गए।

समय के बीतने के साथ ही उनसे सब कुछ छीनता चला गया। करोड़ों की संपत्ति और व्यापार होने के बावजूद अपनी ही मालिकियत की फैक्ट्रियों में उनके बेटों को नौकर बनकर काम करना पड़ा। कंपनी के साथ ही जमीन-जायदाद भी दस्तावेज के आधार पर उनके रिश्तेदार और उनके बेटों ने हथियाकर अपने पास रख लिए। बात इतने पर ही खत्म नहीं हुई, विभिन्न बैंकों में उनके खातों को बिना इनके हस्ताक्षर चलाया जा रहा था और लगातार उसमें से रुपए निकाले जा रहे थे। बेहद बड़े आश्चर्य की बात है कि इस काली कारगुजारी में बैंक के अधिकारी भी पूरी तरह शामिल थे।

बिना असली हस्ताक्षरों के बैंक भी ठगी में शामिल होकर मानो दोनों हाथों से मदन मोहन अग्रवाल तथा रजनी अग्रवाल के पैसे लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। इनकम टैक्स रिटर्न भी इन्हीं का भरा जा रहा था पर इनको जानकारी तो छोड़े भनक भी नहीं लग पा रही थी। इनके नाम का आयकर आखिर भर कौन रहा है, इस बात की जांच जब बेटे ने की तो उनके पैरों तले जमीन सरक गई। एक ही नहीं कई बैंकों में जो उनके खाते थे, जिसकी जानकारी केवल मदन मोहन अग्रवाल और उनके साझेदार भाई रमेश चंद्र अग्रवाल को ही थी। मदन मोहन गंभीर शारीरिक तकलीफ के चलते ना ही बोल पाते और ना किसी को बता पाते। इसी बात का फायदा उठाकर उनकी हर खातों से फर्जी हस्ताक्षर कर धड़ल्ले पैसे उड़ाए जा रहे थे। इस परिवार ने जालसाजी को रोकने और उसे उजागर करने की विनती बैंक अधिकारियों से की, लेकिन वह भी इस जालसाजी में मिले हुए थे तो ना ही उन्होंने कोई गुहार सुनी और ना ही मदद की।

दर्जनों चेक जाली हस्ताक्षर के बैंकों मैं उपयोग किए गए और बैंकों ने बड़ी आसानी से होने दिए। इस बात की शिकायत आर्थिक अपराध शाखा में भी की गई पर अब तक पुलिस महकमे के इस विभाग ने भी इस मामले को ना जाने क्यों जांच का विषय नहीं समझ रखा है। बैंक मैनेजर या आरोपी पक्ष जिन के खातों में यह दर्जनों फर्जी चेक क्लियर होकर उन्हें फायदा पहुंचा चुके हैं, उन्हें तक बुलाने की जहमत पुलिस विभाग ने नहीं उठाई।

रजनी अग्रवाल के नाम का जाली उपयोग कर उनके खातों से भी पैसे उड़ाए गए, जिसमें पंजाब नेशनल बैंक तथा नागपुर नागरिक सहकारी बैंक के प्रशासन या अधिकारियों की गैर-जिम्मेदारी शामिल है। उनके खातों से पैसे निकलकर विशाल अग्रवाल, उर्मिला अग्रवाल, नीलेश अग्रवाल तथा वैभव अग्रवाल में पहुंचाए गए। सबूतों के साथ यह बात शीशे की तरह साफ होने के बावजूद पुलिस प्रशासन इतनी बड़ी जालसाजी को भी जांचने की और कार्रवाई करने की तकलीफ नहीं उठा रहा। जमीन जायदाद और नगद कंपनी की मिलकियत यह सब मिलाकर रजनी अग्रवाल के परिवार की जो ठगी हुई है, वह कुल मिलाकर एक, दो नहीं तीन सौ से लेकर साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की है।

इतना बड़ा ठगी का मामला शायद ही पूरे सूबे में कोई दूसरा होगा पर बैंक प्रबंधन तथा पुलिस विभाग के सिर पर जूं तक नहीं रेंग रही। पीड़ित परिवार अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, लेकिन उनकी सुनवाई न जाने क्यों नहीं हो पा रही। हर दस्तावेज के साथ सबूत पेश किए गए। साफतौर पर देखने वाला बच्चा भी इस जालसाजी को पहचान सकता है पर उच्च शिक्षा लिए छोटे और बड़े पुलिस अधिकारी इस मामले को समझने की कोशिश ही शायद नहीं कर रहे। अगर इसी तरह मजलूम मजबूर और परेशान लोगों की सुनवाई प्रशासन नहीं करें तो कानून और व्यवस्था पर भला विश्वास कौन करेगा।