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Exclusive: यह है मालदा में हुई हिंसा का सच...

नई दिल्‍ली (11 जनवरी): 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा में अचानक हजारों लोगों की भीड़ सड़क पर उतरी थी। इस भीड़ के सड़क पर प्रदर्शन की वजह दिखाई गई हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी का पैगंबर मोहम्मद पर कथित विवादित बयान। तीन जनवरी की दोपहर फिर हजारों लोगों की भीड़ ने ही मालदा के कालियाचक थाने में घुसकर आग लगा दी, खूब हिंसा हुई। पूरे देश में मालदा सुर्खियों में आ गया। लगा वहां दो धर्मों के बीच हिंसा हुई है। मालदा की तुलना सियासत में नोएडा के दादरी में हुए कांड से की जाने लगी। इतना सब कुछ हुआ लेकिन आपको मालदा का असली सच अब तक नहीं पता चला होगा।

नए साल को शुरु हुए तीन दिन ही बीते थे, जब पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 350 किलोमीटर दूर सवा सोलह लाख आबादी वाला शहर मालदा अचानक पूरे देश की सुर्खियों में आ गया। क्योंकि तीन जनवरी को इस शहर में आग लगी हुई थी। हजारों की भीड़ गुस्से में NH-34  से प्रदर्शन करते हुए उठी और मालदा के चौरंगी चौक को पार करते हुए कालियाचक थाने में दाखिल होती है। भीड़ ने कालियाचक थाने में आग लगा दी। थाने में मौजूद गाड़ियों को फूंक दिया। भीड़ ने थाने की फाइलें जला दीं। वहां पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी। मालदा की आग में सांप्रदायिक हिंसा का रंग सियासत ने देखा। क्योंकि मालदा में इस भीड़ का गुस्सा दावा था इसलिए फूटा क्योंकि हजारों मुस्लिम नाराज थे हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी महीनेभर पहले दिए बयान से। आरोप है कि महीने भर पहले कमलेश तिवारी ने पैंगबर मोहम्मद पर जो कथित तौर पर विवादित बयान दिया। उसके बदले तीस दिन बाद मालदा में ये हिंसा हुई।

हजारों मुस्लिमों की भीड़ उस दिन मालदा के एनएच 34 चौराहे के पास प्रदर्शन करने के लिए जुटी थी। हाथ में कटिंग थीं। जो बताती थीं, कि इस भीड़ को हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के उस कथित बयान के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने के लिए जुटाया गया था, जिसमें दावा है कि कमलेश तिवारी ने महीने भर पहले पैगंबर मोहम्मद पर विवादित बात कही थी। फिर ढाई घंटे के भीतर NH-34 के पास जुटी भीड़ का गुस्सा ऐसा भड़का कि लोग चौरंगी चौक की तरफ बढ़ने लगे। उस वक्त किसी को अंदेशा भी नहीं था कि तीन जनवरी को मालदा में जुटे ये हजारों मुस्लिमों की भीड़ क्या करने वाली है।

तीन जनवरी की उस दोपहर दिन चढ़ने के साथ मालदा की सड़कों पर माहौल बदल गया। चौरंगी चौक से सिर्फ 350 मीटर की दूरी पर मौजूद मालदा का कालियाचक थाने में भीड़ घुस जाती है। लोगों ने थाने में आगजनी शुरू कर दी। लेकिन इसके बाद भीड़ ने मालदा के इस थाने में जो कुछ किया उसी से मालदा का असली सच सामने आता है। जो बताता है कि मालदा में उस दिन कालियाचक थाने में घुसी भीड़ का गुस्सा सिर्फ कमलेश तिवारी के पैगंबर मोहम्मद के ऊपर दिए गए कथिय बयान पर नहीं था। भीड़ को निर्देश कुछ और था। निशाने पर थीं थाने की वो फाइलें जिनमें कैद था नकली नोटों के मामले का कच्चा चिट्ठा।

ग्राउंड जीरो से मालदा का सच:

दावा है कि तीन जनवरी को मालदा के कालियाचक थाने में नब्बे फीसदी में उन फाइलों को हजारों लोगों की भीड़ ने जानबूझकर आग लगा दी थी। जिनमें मालदा से संचालित होने वाले जाली नोट के काले कारोबार से जुड़े लोगों का कच्चा चिट्ठा था। दावा यहां तक है कि NIA भी जल्द मालदा आकर नकली करेंसी के इस काले खेल में कुछ बड़े लोगों के चेहरे पर पड़ा पर्दा उठाने वाली थी। इसीलिए उससे पहले हिंदू महासभा के कमलेश तिवारी के पैगंबर मोहम्मद वाले तीस दिन पुराने कथित विवादित बयान को आधार बनाकर हिंसा भड़काने की सुनियोजित साजिश रची गई। और इसी दम पर भीड़ ने थाने में बंद उन लोगों को छुड़ा लिया, जो जाली नोट का जाल फैलाने सौदागर थे।

पचास से पचपन फीसदी मुस्लिम आबादी वाले मालदा में सिर्फ नकली नोटों का नेटवर्क ही नहीं संचालित होता, बल्कि यहीं से होता है ड्रग्स का बड़ा खेल भी। क्योंकि मालदा को ड्रग्स के खेल में हिंदुस्तान का मिनी अफगानिस्तान भी कहा जाता है। यहां पर अफीम की पैदावार भी खूब की जाती है। दावा है कि मालदा में तीन जनवरी को धर्म के नाम पर गुस्से की आग भड़काने की साजिश रचकर एक कोशिश ये भी थी कि करोड़ों की जब्त अफीम छुड़ा ली जाए।  

मालदा का गोपालगंज, कालियाचक, मोहब्बतपुर, मोठाबारी और दांगा ये वो इलाके हैं जहां से पूरे देश में जाली नोट, अवैध हथियार और ड्रग्स का रैकेट चलता है। क्योंकि बॉर्डर से चंद किलोमीटर दूर मालदा के इन इलाकों में वो हर गैरकानूनी काम होता है, जिसमे देशविरोधी ताकतें अंजाम देती हैं। मालदा में तीन जनवरी को हुई हिंसा को भी इन्हीं ताकतों की फैलाई गई साजिश बताया जा रहा है। मालदा की आग सांप्रदायिक तनाव की लकड़ियों से नहीं भड़की थी। इस बात का सबूत मालदा के कालियाचक थाने का वो छोटा सा मंदिर भी है, जिसे गुस्साई भीड़ देखती भी नहीं। भीड़ सिर्फ अपने मकसद के हिसाब से थाने में घुसकर जाली नोट के मामलों वाली फाइल जलाती है। मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती।

पश्चिम बंगाल के इंटेलिजेंस ब्यूरो के बड़े अफसर ये खुलकर मानते हैं कि मालदा में हिंसा भड़काने का सिर्फ एक ही मकसद था वो था स्थानीय प्रशासन को आतंकित करना, पुलिस स्टेशन में रखे सबूतों को नष्ट करना। और संप्रदायिक तनाव के नाम पर ऐसी आग भड़काकर ये कोशिश करना कि मालदा नकली नोटों, अवैध हथियारों और ड्रग्स के खेल में सबसे बड़ा हब बना रहे।

हमने ग्राउंड जीरो से अपनी रिपोर्ट में पाया कि उस दिन भीड़ का पहला मकसद थाने की उन फाइलों को जलाना था, जिसमें जाली नोट के सैकड़ों मामले दर्ज थे। सिर्फ इतना ही नहीं अगला मकसद थाने में बंद उन दस लोगों को छुड़वा लेना, जो जाली नोट का जाल मालदा के रास्ते देश में फैलाने के आरोप में बंद थे और तीसरा मकसद था पुलिस को आतंकित करना। ताकि मालदा की जमीन फूल-फूल रहे ड्रग्स के कारोबार पर पुलिस और इंटेलिजेंस एजेसियां नजर ना रखें।


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