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असहिष्‍णुता को लेकर जावेद अख्‍तर ने दिया बड़ा बयान

नई दिल्‍ली (27 जनवरी): जाने-माने गीतकर, लेखक व शायर जावेद अख्‍तर ने असहिष्‍णुता को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। अख्‍तर ने कहा है कि कुछ तत्वों को छोड़ दिया जाए, तो भारतीय समाज हमेशा सहिष्णु रहा है। यह मेरा खुद का अनुभव और तजुर्बा है।

जावेद अख्‍तर ने कहा कि मैंने 1975 में मंदिर में एक हास्य दृश्य दिखाया था। मैं आज ऐसा नहीं करूंगा, लेकिन 1975 में भी मैं मस्जिद में ऐसा दृश्य नहीं दिखाता, क्योंकि वहां असहिष्णुता थी।' उन्होंने आमिर खान अभिनीत हिंदी फिल्म 'पीके' का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदुओं ने ही इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफल बनाया। मुझे यह समझ नही आता कि कोई भी व्यक्ति अपनी सफलता की वजहों को कैसे भूल सकता है।

अख्तर ने कहा, 'मुझे वाकई इस बात को लेकर संदेह है कि यदि आप किसी इस्लामी देश में मुस्लिम प्रतीकों को लेकर फिल्म बनाएंगे, तो क्या वह सुपरहिट होगी। शायद नहीं, लेकिन भारत में ऐसी फिल्में सुपरहिट होती हैं। हम विवादों की स्थिति में अतिवादी रुख अपना लेते हैं।' उन्‍होंने कहा, 'कुछ लोगों का कहना है कि समाज में असहिष्णुता खतरे के स्तर पर पहुंच गई है। मुझे इस बात पर भरोसा नहीं है। कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि कोई असहिष्णुता नहीं है। मुझे उन पर भी भरोसा नहीं है। असलियत इस दोनों स्थितियों के बीच है। सच्चाई यह है कि भारतीय समाज हमेशा ये सहिष्णु था और है। समाज के कुछ ऐसे वर्ग हैं, जो हमेशा भिड़े रहते हैं।'

जावेद अख्तर ने कुछ लेखकों की 'पुरस्कार वापसी' मुहिम के बीच अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, 'क्योंकि मैं जानता हूं कि यह पुरस्कार मुझे लेखकों ने दिया है, तो मुझे इसे क्यों लौटाना चाहिए? अवॉर्ड लौटाने का सवाल ही नहीं उठता।' उन्‍होंने कहा कि लेखक इस जूरी का हिस्सा होते हैं, न कि पुलिसकर्मी या नौकरशाह। मैं नयनतारा सहगल (के मामले) को समझता हूं। उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए ऐसा नहीं किया। शायद उन्हें लगा कि इस तरह वह विरोध जाहिर कर सकती हैं। साहित्य निकाय लोगों की हत्या होने से नहीं रोक सकता। मैं अपना अकादमी पुरस्कार नहीं लौटा सकता।'


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