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साईं को सदा जीवित ही जानों, अनुभव करो, सत्य पहचानों

नई दिल्ली ( 15 अक्टूबर ) : साईं बाबा का जन्म 28 सितंबर 1835 को महाराष्ट्र के पथरी में हुआ था ऐसा माना जाता है। क्योंकि उनके जन्म के बारे में किसी को साफ-साफ पूरी जानकारी नहीं हैं।  उनकी मृत्यु महाराष्ट्र के ही शिरडी में 15 अक्टूबर 1918 को हुई थी।  तब से ही 15 अक्टूबर को साईं बाबा महानिर्वाण दिवस मनाया जाता है। साईं बाबा ने अपने जीवन काल में अनेकों चमत्कार किए। उनके भक्त देश ही नहीं पूरी दुनिया में हैं। श्री शिरडी साईं बाबा के अनुसार श्रद्धा एवं सबूरी भक्ति-मार्ग के दो आवश्यक गुण हैं। 
 
लोगों का मानना है कि वह ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे।  हालांकि उन्होंने किसी को भी अपने परिवार, जाति या धर्म के बारे में नहीं बताया। उनका जीवन बेहद सादा था।  वह भौतिकता से कोसों दूर रह कर साधारण जीवन जीते थे। वे शेलू ग्राम के एक ब्राह्मण संत गुरु वेंकुशा के आश्रम में 12 वर्ष रहे थे। 1854 में अपने गुरु के आदेश व आशीर्वाद के साथ शिरडी ग्राम पहुंचे थे।  वहां लगभग दो माह रहने के बाद वह अचानक वहां से चले गए और पुनः तीन वर्ष बाद 1858 में चांदभाई पाटिल (मुस्लिम जागीरदार) के भतीजे की बारात के साथ बैलगाड़ी में बैठकर शिरडी आए थे और फिर वहीं बस गए थे। वहां उन्होंने एक पुरानी त्यागी हुई वीरान मस्जिद को अपना स्थान बनाया और उसे द्वारिका माई का नाम दिया था। 
 
वे हमेशा अल्लाह मालिक है, कहते रहते थे और सभी से, चाहे वह मानव हो या पशु-पक्षी, प्रेम और भाईचारे का व्यवहार करने का उपदेश देते थे।  उन्हें संस्कृत, ऊर्दू, अरबी, मराठी, हिंदी और तमिल की जानकारी थी। वह शिरडी ग्राम के केवल पांच विशेष परिवारों से ही रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगकर लाते थे।  कुत्ते, बिल्लियां और पक्षी नि:संकोच आकर उनके भोजन का कुछ हिस्सा खा लेते थे। भोजन का जो हिस्सा बच जाता था, उसे वह अपने भक्तों के साथ मिल-बांट कर खा लेते थे।  कहा जाता है कि वह त्रिकालदर्शी थे और लोगों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में जानते थे। लोग अपने कष्टों और समस्याओं के निदान के लिए बाबा के पास जाते थे और वहां से पूर्णत: संतुष्ट होकर लौटते थे।  उन्होंने जिसको आशीर्वाद दिया, वह अवश्य ही फलीभूत हुआ। 
 
उनमें कोई दिखावा नहीं था। उन्होंने लोगों के कल्याण के लिए कई चमत्कार किए थे। उनके चमत्कारों तथा भक्तों पर अनुग्रह की ख्याति धीरे-धीरे संपूर्ण विश्‍व में फैल गई। उनके इन सद्गुणों के कारण ही उन्हें विश्‍व गुरु स्वीकार किया गया है। लोगों का मानना है कि जो नित्य प्रति उनके नाम का स्मरण और पूजन करता है और उनकी कथाओं और लीलाओं का प्रेम पूर्वक मनन करता है, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएं और अज्ञान रूपी प्रवृतियां नहीं ठहर सकती हैं। ऐसे भक्तों को वह मृत्यु से बचा लेते हैं। उनकी कथाओं को श्रद्धा पूर्वक सुना जाए, मनन किया जाए, तो सुख और संतोष की प्राप्ति आसानी से संभव है। इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त हो जाएगी। केवल साईं-साईं के उच्चारण मात्र से ही भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाएंगे.
 
सभी ने ऐसा उपदेश दिया है कि प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है, आत्मा, परमात्मा की चिंगारी है, जो परमात्मा से ही निकली है और पुनः उन्हीं में लौट कर विलीन हो जाती है, लेकिन श्री शिरडी साईं बाबा ही ऐसे एकमात्र अवतार पुरुष हुए हैं, जिन्होंने यह प्रयोग कई बार कर के दिखलाया था कि कैसे प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है. 
 
 
श्री सदगुरू साईं बाबा के ग्‍यारह वचन
1. जो शिरडी आएगा, आपदा दूर भगाएगा.
2. चढ़े समाधि की सीढ़ी पर, पैर तले दुख की पीढी पर.
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौड़ा आऊंगा.
4. मन में रखना दॄढ विश्वास, करे समाधि पूरी आस. 
5. मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो, सत्य पहचानो.
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए.
7. जैसा भाव रहा जिस मन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का.
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा.
9. आ सहायता लो भरपूर, जो मांगा वह नहीं है दूर.
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया.
11. धन्य धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य.


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