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सऊदी अरब की उम्मीदें खाक, नहीं बन पाया इस्लामी देशों कि सबसे बड़ी ताकत

नई दिल्ली (7 जनवरी): यमन और सीरिया में बुरी करह मुंह की खाने के बाद सऊदी अरब की इस्लामी जगत की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरने की मंशा अधूरी रह गयी है। सबसे गरीब देश यमन और सबसे कमजोर शासक बशर अल असद को कमजोर आंकने की गल्ती से अरब को भारी आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। पिछली आधी सदी से सऊदी पूरे अरब और इस्लामिक देशों के बीच खुद को सबसे बड़ी ताकत बनाने की जुगत में लगा हुआ था। 2 साल पहले तक उसकी कोशिशें सफल होती भी दिख रही थीं। 2014 में तत्कालीन सेक्रटरी ऑफ स्टेट हिलरी क्लिंटन द्वारा भेजे गए एक पेपर को विकिलीक्स ने लीक किया था।

 इसमें हिलरी ने लिखा था कि सऊदी और कतर एक दूसरे के साथ 'सुन्नी देशों' में अपना दबदबा कायम करने की प्रतियोगिता कर रहे हैं। दिसंबर 2015 में जर्मनी की विदेशी खुफिया सेवा बीएनडी सऊदी के बढ़ते दबदबे से इतनी घबराई हुई थी कि उसने इस बारे में एक मेमो जारी किया। इस मेमो में कहा गया था, 'सऊदी राजशाही के बुजुर्ग सदस्य पहले अपने कूटनीतिक आधार को लेकर काफी सावधानी बरतते थे। अब इसकी जगह दखलंदाजी की आक्रामक नीति काम कर रही है।' इस मेमो को लेकर कूटनीतिक तौर पर जर्मनी को काफी असहज स्थिति झेलनी पड़ी। इसके बाद जर्मन सरकार ने बीएनडी को यह मेमो वापस लेने का निर्देश दिया। पिछले एक साल के दौरान बीएनडी की आशंकाएं सही साबित होती दिखीं। सऊदी की आक्रामक नीतियों के कारण जो अस्थिरता की स्थिति आई, वह सबके सामने है। बीएनडी बीएनडी ने हालांकि एक बात का अनुमान नहीं लगाया था, वह यह कि सऊदी को किस तरह करीब-करीब हर मोर्चे पर बड़ी तेजी से अपनी महत्वाकाक्षांओं को टूटते हुए देखना होगा।


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