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सऊदी अरब और ईरान के बीच अब फारस की खाड़ी के लिए जंग!

नई दिल्ली(3 फरवरी): सऊदी अरब और ईरान में झगड़ा बढ़ता जा रहा है। शिया धर्मगुरु को फांसी दिए जाने के बाद बढ़ा ये झगड़ा अब फारस की खाड़ी तक जा पहुंचा। इस पर अपना एकाधिकार और ताकत दिखाने की गरज से सऊदी अरब ने इस खाड़ी को अरब की खाड़ी कहना शुरू कर दिया है। साथ ही अपने सहयोगी देशों पर भी इसे अरब की खाड़ी कहने का दबाव बना रहा है।

सऊदी अरब के इस रवैये से नाराज ईरान का कहना है कि अरब सागर के इस हिस्से को सदियों से फारस की खाड़ी के नाम से जाना जाता है। अब सऊदी अरब एक सोची समझी रणनीति के तहत इसका नाम बदलने में जुटा है। ईरान का कहना है कि वो किसी भी कीमत पर फारस की खाड़ी का नाम नहीं बदलने देगा। 

ईरान, इराक, कुवैत, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, यूएई और ओमान से गुजरने वाले पानी के जहाज इसी फारस की खाड़ी से होकर जाते हैं। दुनियाभर के मुल्कों के मालवाहक जहाज समुद्र मार्ग के जरिए फारस की इसी खाड़ी से होकर ही खाड़ी देशों तक पहुंचते हैं। ब्रिटिश राज से लेकर अब तक अरब सागर का ये हिस्सा फारस की खाड़ी के नाम से ही जाना जाता रहा है। यहां तक कि 2006 में संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज में भी इस खाड़ी को फारस की खाड़ी ही लिखा गया है।

इतिहासकार लॉरेंस जी पॉटर के मुताबिक 1960 के दशक में अरब देशों ने गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल पर दबाव बनाया कि इसे फारस की खाड़ी के बजाय अरब की खाड़ी कहा जाए। इसे काउंसिल ने मान लिया और उसके सभी सदस्य देश इसी नाम का इस्तेमाल करने लगे। दरअसल खाड़ी के इलाके में अपना वर्चस्व दिखाने के लिए सऊदी अरब और उसके मित्र देशों ने 1950 से इस खाड़ी को अरब की खाड़ी कहना शुरू किया था। अमेरिकन नेवी 1991 से ही इस इलाके को अरब की खाड़ी कह रही है। अमेरिका अपने इस कदम को सऊदी के साथ दोस्ताना रिश्तों के लिए जरूरी मानता है।

अमेरिकन नेवी के कमांडर स्टीफंस का कहना है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है कि अपने मित्र राष्ट्र के समर्थन और एकजुटता दिखाने के लिए ये जरूरी है कि हम भी उसी नाम का इस्तेमाल करें जो हमारे मित्र देश कर रहे हैं। खाड़ी में हमारे मित्र बहरीन और दूसरे खाड़ी देश इसे अरब की खाड़ी कहते हैं, इसीलिए हम भी उसी नाम का इस्तेमाल करते हैं।

क्या है फारस की खाड़ी 

फारस की खाड़ी पश्चिम एशिया में हिंद महासागर का एक विस्तार है, जो ईरान और अरब प्रायद्धीपके बीच तक गया हुआ है। 1980-1988 के ईरान इराक युद्ध के दौरान यह खाड़ी लोगों के कौतूहल का विषय बनी रही जब दोनों पक्षों ने एक दूसरे के तेल के जहाजों (तेल टैंकरों) पर आक्रमण किया था। 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान, फारस की खाड़ी एक बार फिर से चर्चा का विषय बनी, हालांकि यह संघर्ष मुख्य रूप से एक भूमि संघर्ष था जब इराक ने कुवैत पर हमला किया था और जिसे बाद में वापस पीछे ढकेल दिया गया।


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