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दिल्ली हाईकोर्ट ने तंदूर कांड के दोषी सुशील शर्मा को रिहा करने का दिया आदेश

1995 तंदूर हत्याकांड मामले के दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी सुशील शर्मा को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए है। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सरकार से यह बताने के लिए कहा था कि क्या किसी कैदी को अनिश्चितकाल तक जेल में बंद रखा जा सकता है, खासकर तब जब वह पहले ही सजा काट चुका है। हाईकोर्ट ने पत्नी नैना साहनी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहे युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा को रिहा नहीं किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सरकार से यह जवाब मांगा था।

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (21 दिसंबर): 1995 तंदूर हत्याकांड मामले के दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी सुशील शर्मा को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए है। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सरकार से यह बताने के लिए कहा था कि क्या किसी कैदी को अनिश्चितकाल तक जेल में बंद रखा जा सकता है, खासकर तब जब वह पहले ही सजा काट चुका है। हाईकोर्ट ने पत्नी नैना साहनी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहे युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा को रिहा नहीं किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सरकार से यह जवाब मांगा था।

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और एस.डी. सहगल की बेंच ने सरकार से यह बताने के लिए कहा था कि 29 साल की सजा पूरी कर चुके शर्मा को क्यों नहीं रिहा किया गया। वर्ष 1995 में पत्नी नैना साहनी की हत्या कर बगिया रेस्टोरेंट के तंदूर में उसके शव को जलाने के जुर्म में शर्मा उम्रकैद की सजा काट रहा है। बैंच ने कहा था कि यह कैदी के मानवाधिकार से संबंधित है, लिहाजा यह बेहद गंभीर है।  

बैंच ने कहा है कि याचिकाकर्ता ‌सजा को कम किए जाने के बावजूद 25 सालों से ज्यादा समय से जेल में है। हाईकोर्ट ने कहा था कि हत्या अपने आप में बर्बर है, दोषी ने पहले ही सजा काट ली है, क्या यह मानवाधिकार का हनन नहीं है। बैंच ने कहा है कि किसी के भी मानवाधिकार भले ही वह कैदी ही क्यों न हो, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। हाईकोर्ट ने कहा है कि सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) यह नहीं कह सकता कि यह हत्या बर्बर थी, इसलिए हम उसे रिहा नहीं करेंगे।  

बैंच ने यह आदेश जेल में बंद सुशील शर्मा की ओर से वकील अमित साहनी द्वारा दाखिल याचिका पर दिया है। शर्मा की ओर से वकील साहनी ने बैंच को बताया था कि उम्रकैद की सजा पाए कैदियों की रिहाई के लिए सरकार ने दिशा-निर्देश तय किए हैं। साहनी ने बताया कि इसके तहत उम्रकैद की सजा पाए किसी कैदी का पहला अपराध है तो 20 साल, गंभीर अपराध होने पर 25 साल की सजा के बाद रिहा करने का प्रावधान किया है। याचिका में साहनी ने कहा है कि जहां तक उनके मुवक्किल का सवाल है तो वह 23 साल छह माह कैद और अच्छे व्यावहार के लिए मिली सजा माफी (रिमिशन) को मिलाकर 29 साल की सजा पूरी कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल का अपराध पहली श्रेणी का है और ऐसे में अब रिहा किया जाना चाहिए। यचिका में कहा गया है कि सरकार ने बिना कारण बताए उनके मुवक्किल की रिहाई की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।


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