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बैडमिंटन के चैंपियन तैयार करते हैं गोपीचंद, ऐसी रही संघर्ष की कहानी

नई दिल्ली (14 नवंबर): भारत के सबसे बेहतरीन बैंडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद का नाम तो हर किसी ने सुना है। 2012 लंदन ओलिंपिक में जब साइना नेहवाल ने इतिहास रचते हुए बैडमिंटन में भारत के लिए पहला पदक जीता था तो इसके पीछे उनके कोच पुलेला गोपीचंद ही थे, जिनके मार्गदर्शन में साइना ने मेडल जीता। इसके बाद रियो ओलिंपिक में जब सिंधु ने सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया तो इसके पीछे भी उनके कोच गोपीचंद थे।

सिंधु और साइना की सफलता के पीछे गोपीचंद ने द्रोणाचार्य बन अपने शिष्यों को अर्जुन बनाया। सिर्फ साइना और सिंधु नहीं बल्कि भारत के कई और खिलाड़ी गोपीचंद की अकादमी का हिस्सा रहे हैं। किदांबी श्रीकांत,पी कश्यप, गुरुसाई दत्त, तरुण कोना जैसे बैडमिंटन खिलाड़ी गोपीचंद के शिष्य रहे हैं।

गोपीचंद आज एक सफल कोच है लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपने जीवन में बहुत सघर्ष किया। शायद आप नहीं जानते होंगे कि कभी ऐसा भी समय था जब गोपीचंद के पास रैकेट खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हुआ करते थे। अपना पहला बैडमिंटन रैकेट खरीदने के लिए गोपीचंद को अपने घर के गहने बेचने पड़े थे, लेकिन इसके बाद भी गोपीचंद की समस्याएं कम नहीं हुई। गोपीचंद को अपने करियर में कई बार चोटो का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, अपनी मेहनत और लगन से गोपीचंद ने हर समस्या से पार पाते हुए अपने सफलता हासिल की और करियर में कई पदक जीते।

गोपीचंद ने जब अपनी अकादमी शुरु की तब ऐसा लग रहा था कि वह इसमें सफल नहीं होंगे। गोपीचंद को अपनी अकादमी के लिए काफी संर्घष करना पड़ा। गोपीचंद को अकादमी बनाने के लिए जमीन तो मिल गई थी लेकिन प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे, इसके बाद जब कहीं से कोई मदद नहीं मिली तो उन्होंने अकादमी बनाने के लिए अपना घर गिरवी रख दिया। इन तमाम समस्याओं से पार पाकर गोपीचंद आज बैडमिंटन के सबसे सफल कोच के रुप में माने जाते हैं।  गोपीचंद को अर्जुन अवॉर्ड से लेकर द्रोणाचार्य अवॉर्ड से भी नवजा जा चुका है। उनके संघर्ष की कहानी युवा पीढ़ी के लिए के प्रेरणास्त्रोत है।


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