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प्रयाग कुंभ में दलित संत बने महामंडलेश्वर, लोगों से 'घर वापसी' की मांग की

प्रयागराज में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दलित समुदाय से संन्यास लेकर संत बने कन्हैया प्रभु नंद गिरी को महामंडलेश्वर की उपाधि दी हैं। खबरों के मुताबिक स्नान से पहले 13 जनवरी को विभिन्न अखाड़ों में महामंडलेश्वर बनाने का क्रम शुरू हुआ। त्रिवेणी पांटून पुल के पास पट्टाभिषेक संस्कार में संतों को महामंडलेश्वर बनाया गया। कामाख्या पीठाधीश्वर और जूना अखाड़े के जगद्गुरु पंचानंद गिरि के तीन शिष्यों को महामंडलेश्वर पद पर पट्टाभिषेक किया गया, इसमें दलित समाज के कन्हैया प्रभुनंद गिरि जी हैं, जो इस वर्ग से आने वाले पहले महामंडलेश्वर बनें।

न्यूज24 ब्यूरो, नई दिल्ली (16 जनवरी): प्रयागराज में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दलित समुदाय से संन्यास लेकर संत बने कन्हैया प्रभु नंद गिरी को महामंडलेश्वर की उपाधि दी हैं। खबरों के मुताबिक स्नान से पहले 13 जनवरी को विभिन्न अखाड़ों में महामंडलेश्वर बनाने का क्रम शुरू हुआ। त्रिवेणी पांटून पुल के पास पट्टाभिषेक संस्कार में संतों को महामंडलेश्वर बनाया गया। कामाख्या पीठाधीश्वर और जूना अखाड़े के जगद्गुरु पंचानंद गिरि के तीन शिष्यों को महामंडलेश्वर पद पर पट्टाभिषेक किया गया, इसमें दलित समाज के कन्हैया प्रभुनंद गिरि जी हैं, जो इस वर्ग से आने वाले पहले महामंडलेश्वर बनें।कन्हैया प्रभुनंद गिरि नाम के इस संत ने कुंभ के पहले दिन शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई। उन्होंने आह्वान किया कि जो भी दलित, आदिवासी, पिछड़ी जाति के लोग शोषण के डर से सनातन धर्म छोड़कर ईसाई, मुसलमान या बौद्ध बन चुके हैं, उन्हें घर वापसी कर लेनी चाहिए।इस मौके पर उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि मेरे समुदाय के वे सभी सदस्य जिन्होंने असमानता के चलते इस्लाम, ईसाई और बौद्ध धर्म अपना लिया था, वे वापस सनातन धर्म से जुड़ जाएं। मैं उन्हें दिखाना चाहता हूं कि कैसे जूना अखाड़े ने मुझे खुद में शामिल कर लिया है।’कन्हैया प्रभुनंद ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में जो जातिगत अपमान और शोषण का सामना किया है वह उनके लिए एक गोली के दर्द से भी कहीं अधिक है। इसी वजह से एक बार उन्होंने हिंदू धर्म तक छोड़ने की ठान ली थी।महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद ने कहा कि अब मैं ऐसे पद पर हूं जहां सभी जातियों के लोग मेरे आगे झुकते हैं। मैं एक धार्मिक नेता हूं और इस जातिगत मानसिकता के खिलाफ लड़ता रहूंगा।’उन्होंने बताया कि दसवीं के बाद वह संस्कृत पढ़ना चाहते हैं लेकिन अनुसूचित जाति से होने की वजह से उन्हें इजाजत नहीं मिली। उन्होंने बताया, ‘तब मैं अपने गुरु जगतगुरु पंचनंदी महाराज की शरण में आया जिन्होंने मुझे शिक्षा दी और मंदिर का पुजारी बनाया। लेकिन कुछ दिन बाद मेरे ऊपर कुछ गुंडों ने हमला किया। मेरे हाथ की एक उंगली टूट गई और मंदिर में भी तोड़फोड़ हुई। मुझ पर जातिगत टिप्पणियां की गईं।’कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने खुद को महामंडलेश्वर बनाए जाने के पलों को याद करते हुए कहा कि ‘मेरे लिए उस पल को बयां कर पाना मुश्किल है जब मुझे शाही स्नान के लिए रथ पर बिठाया गया था।मेरे आसपास सभी श्रद्धालु ढोल की धुन पर नाच रहे थे। मेरा समुदाय काफी समय तक ऐसे सम्मान से दूर रहा जबकि हमने संविधान लिखकर और मुगलों व अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करके खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से साबित भी किया।’महामंडलेश्वर बन चुके कन्हैया प्रभुनंद गिरि का नाम संन्यास लेने से पहले कन्हैया कुमार कश्यप था। वह उत्‍तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के थाना बिलरियागंज में गांव बरौनी दिवाकर पटटी के रहने वाले हैं।उन्होंने साल 2016 में उज्‍जैन सिंहस्‍थ कुंभ के दौरान पटियाला (पंजाब) में काली मंदिर स्थित जूना अखाड़े के महंत पंचानन गिरि महाराज से पहली बार संन्‍यास की दीक्षा ली थी। उसी समय उनके गुरु ने उन्हें कन्‍हैया प्रभुनंद गिरि का नया नाम दिया था।


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