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आखिरी संबोधन में बोले प्रणव मुखर्जी, सहिष्णुता, अहिंसा देश की पहचान

नई दिल्ली ( 24 जुलाई ): राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को राष्ट्र के नाम अपने अंतिम संबोधन में देश की सहिष्णुता, बहुलवाद और अहिंसा की शक्ति की बात की। मुखर्जी ने कहा कि भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है। उन्होंने कहा, 'हम एक-दूसरे से तर्क-वितर्क कर सकते हैं, सहमत-असहमत हो सकते हैं, लेकिन विविध विचारों की मौजूदगी को हम नकार नहीं सकते हैं।' उन्होंने कहा कि अनेकता में एकता देश की पहचान है। 

उन्होंने मावेशी राष्ट्र के रूप में देखने की महात्मा गांधी के सपने को दोहराया और कहा कि हमें गरीब से गरीब व्यक्ति को सशक्त बनाना होगा। उन्होंने अगले राष्ट्रपति को शुभकामनाएं दी और देश के उज्जवल भविष्य की कामना की। 

देश के 13वें राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा, 'विभिन्न विचारों को ग्रहण करके हमारे समाज में बहुलतावाद का निर्माण हुआ है। हमें सहिष्णुता से शक्ति प्राप्त होती है। प्रतिदिन हम आसपास बढ़ती हुई हिंसा को देखते हैं तो दुख होता है। हमें इसकी निंदी करनी चाहिए। हमें अहिंसा की शक्ति को जगाना होगा। महात्मा गांधी भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखते थे जहां समावेशी माहौल हो। हमें ऐसा ही राष्ट्र बनाना होगा।'

राष्ट्रपति मुखर्जी की मुख्य बातें 

- मेरे पास कोई उपदेश नहीं है।

- समानता से ही विकास संभव, सभी वर्गों और धर्मों का सम्मान जरूरी।

- हिंसामुक्त समाज भारत के हित में।

- भारत की बहुलता को बनाए रखें।

- दूसरों के विचार को नकार नहीं सकते।

- उच्च संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाना होगा।

- शिक्षा प्रणाली में रुकावटों को स्वीकार करना होगा।

- विश्वविद्यालयों को रटने वालों की जगह नहीं बनाना।

- मानसिक स्वतंत्रता को बढ़ाने की जरूरत।

- गांधी जी भारत को समावेशी राष्ट्र के रूप में देखते थे।

- गरीब से गरीब व्यक्ति को सशक्त बनाना होगा।

- स्वस्थ और खुशहाल जीवन हर नागरिक का अधिकार।

- खुशहाली का लक्ष्य सतत विकास।

- गरीबी मिटाने से खुशहारी में भरपूर खुशहाली आएगी।


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