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भारत के एक ऐलान से पाकिस्तान परेशान, अब लगा रहा है गुहार

इस्लामाबाद (17 दिसंबर): भारत के महज एक ऐलान से ना'पाक' पाकिस्तान का होश उड़ा हुआ है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि अगर भारत सिंधु नदी के पानी को लेकर अगर कोई कार्रवाई करता है तो वो उससे कैसे निपटेगा। लाखों हेक्टेयर जमीन को रेगिस्तान बनने से कैसे बचा पाएगा। लिहाजा पाकिस्तान हर स्तर पर भारत पर दवाब बनाने की रणनीति पर जुटा है।

दरअसल सरहद पर पाकिस्तान कि हरकत और पाकिस्तानी आतंकियों के सीमा पर घुसपैठ से परेशान भारत ने ऐलान किया है कि वो अपने हिस्से के पानी का समुचित उपयोग करेगा। प्रधानमंत्री मोदी भी साफ कर चुके हैं कि भारत के हक का पानी पाकिस्तान नहीं जायेगा। उन्होंने कहा कि जो पानी हमारे किसानों को चाहिए, वह पाकिस्तान से बहकर समुद्र में जाता है। वह पानी अब अपने किसानों के लिए लाने का प्रयास करूंगा।  उन्होंने कहा कि मेरे किसानों को सिंधु के पानी पर पूरा अधिकार है, मैं अपने किसानों को उसके पानी का अधिकार दिलाने के लिए कृत संकल्प हूं।

भारत के इस ऐलान से पाकिस्तान बैखलाया हुआ है। उसे डर है कि भारत कहीं सिंधु जल समझौते कोई बदलाव ना कर ले। पाकिस्तान का कहना है कि वो ऐसे किसी बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा। पाकिस्तान का बयान तब आया है जब दो दिन पहले भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने सिंधु जल संधि को लेकर विश्व बैंक के फैसले पर संतोष जताया था और कहा था कि पाकिस्तान की आपत्तियों का द्विपक्षीय ढंग से निस्तारण किया जा सकता है। विकास स्वरूप ने कहा था कि भारत का हमेशा से मानना रहा है कि सिंधु जल संधि के क्रियान्वयन खासकर तकनीकी सवालों एवं मतभेदों का समाधान भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय ढंग से होना चाहिये।

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के मुताबिक पीएम नवाज शरीफ के विशेष सहयोगी तारिक फातमी ने कहा है कि पाकिस्तान सिंधु जल समझौते के मौजूदा प्रावधानों में किसी तरह के बदलाव या रूपांतरण को स्वीकार नहीं करेगा। हमारा सिद्धांत समझौते में निहित उपबंधों को मानने के लिए प्रतिबद्ध है। इसलिए इस समझौते का हरसंभव पालन किया जाना चाहिए।

पाकिस्तान ने आरोप लगाया है कि भारत दो विवादित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अनुचित दवाब बना रहा है। पाकिस्तान 330 मेगावाट के किशनगंगा प्रोजेक्ट और 850 मेगावाट के रातले परियोजना पर यह कहकर आपत्ति जताता रहा है कि यह सिंधु जल समझौते का उल्लंघन है। यह तनाव उस वक्त और गहरा गया था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इशारों ही इशारों में सिंधु जल समझौते की समीक्षा की बात कही थी।

गौरतलब है कि 56 साल पहले साल 1960 में भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दोनो देशों के बीच दो युद्धों और एक सीमित युद्ध कारगिल के बावजूद ये संधि कायम है। सितंबर में उरी हमले में 18 भारतीय सैनिकों के मारे जाने के बाद एक बार फिर कयास लग रहे हैं कि क्या भारत, सिंधु जल समझौता रद्द कर सकता है?


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