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देश ने चुकाई ऑपरेशन ब्लू स्टार की बहुत बड़ी कीमत

नई दिल्ली (6 जून): 31 अक्टूबर 1984 को अपने घर से निकल रहीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके दो सिख सुरक्षा गार्डों सतवंत और बेअंत सिंह ने गोलियों की बौछार कर दी। ऑपरेशन ब्लू स्टार से पैदा हुई सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ ने प्रधानमंत्री की जान ले ली। प्रधानमंत्री की हत्या के बाद शुरू हुए दंगों ने करीब तीन हजार लोगों की जान ले ली। इनमें से ज्यादातर सिख थे।

इसमें कोई शक नहीं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार ने सिखों को बुरी तरह आहत किया। लेकिन उससे भी ज्यादा नुकसान चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल रही अफवाहों से हुआ। यहां तक कि खुद फौज भी इससे अछूती नहीं रही। फौज में बड़ी तादाद में तैनात सिख जवानों ने विद्रोह कर दिया।

बिहार के रामगढ़ में सिख रेजिमेंट के जवानों ने पूरी छावनी पर कब्जा कर लिया और आर्मी की गाड़ियों पर सवार होकर अमृतसर की तरफ निकल पड़े। आजाद भारत में पहली बार सेना में इस तरह का विद्रोह हुआ था। सैन्य विद्रोह के अलावा ऑपरेशन ब्लू स्टार के तीन दिनों के भीतर ही पंजाब में 30 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। बाहरी ताकतों ने इस माहौल का पूरा फायदा उठाया। पंजाब में अलगाववाद और आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच गया जिसने अगले चार सालों में कई बेगुनाहों की जान ली।


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