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#ElectionResults: यूपी में मोदी लहर 'सुनामी' में तब्‍दील, BJP की जीत के 7 बड़े कारण

नई दिल्ली ( 11 मार्च): उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों के नतीजों से साबित हो गया कि यूपी में मोदी की लहर नहीं बल्कि 'सुनामी' आई है। इस सुनामी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी का 14 साल का सूखा खत्म कर दिया है। रुझानों के मुताबिक यूपी में बीजेपी का केसरिया रंग छा गया है 403 में से 310 सीटों पर बीजेपी गठबंधन आगे हैं। समाजवादी पार्टी 55, बसपा 20 और कांग्रेस 9 सीटों पर सिमट गई है। बीजेपी को 40 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के पक्ष में 43 प्रतिशत मतदान हुआ था और पार्टी को 403 विधानसभा सीटों में 337 पर बढ़त हासिल हुई थी। आखिर मोदी लहर कैसे सुनामी में तब्दील हो गई आइए जानते हैं क्या रहे कारण-

1) पीएम मोदी की ताबड़तोड़ 24 रैलियां- उत्तर प्रदेश में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद चुनाव प्रचार का जिम्‍मा संभाला। पीएम मोदी ने 24 विजय शंखनाद रैलियां की। यूपी की राजधानी लखनऊ से शुरू रैली अपनी संसदीय क्षेत्र वाराणसी के रोहनिंया में खत्म की। इस धुआंधार प्रचार का नतीजा यह हुआ कि चुनाव के ऐन पहले जहां सपा-कांग्रेस गठबंधन को ओपिनियन पोल में बढ़त हासिल थी वहीं मोदी के चुनाव प्रचार शुरू करने के बाद माहौल बदलता गया। उनके भाषणों ने जनता को बीजेपी के प्रति आकर्षित करने का काम किया। अंतिम दौर में तो पूर्वांचल की धुरी वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद आक्रामक प्रचार कर पूरी तरह से माहौल बीजेपी के पक्ष में कर दिया। पीएम मोदी ने की 24 रैलियां- रोहनियां - 6 मार्च, वाराणसी - 5 मार्च, जौनपुर और वाराणसी - 4 मार्च, मिर्जापुर- 3 मार्च, महाराजगंज और देवरिया- 1 मार्च, मऊ- 27 फरवरी, गोड़ा- 24 फरवरी, बहराइच और बस्ती- 23 फरवरी, ऊरई और इलाहाबाद- 20 फरवरी, फतेहपुर- 19 फरवरी, हरदोई और बाराबंकी- 16 फरवरी, कन्नौज- 15 फरवरी, लखीमपुर खीरी- 13 फरवरी, बदायूं- 11 फरवरी, बिजनौर- 10 फरवरी, गाजियाबाद- 8 फरवरी, अलीगढ़- 5 फरवरी, मेरठ- 4 फरवरी, लखनऊ- 2 जनवरी।

2) अमित शाह का प्रबंधन- बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी के लिए एक खास स्ट्रटेजी बनाई। पिछले साल अप्रैल में शाह ने सबसे बड़ा चुनावी दांव खेलते हुए लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जगह ओबीसी चेहरे केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश इकाई का जिम्मा सौंपते हुए प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। सपा के ओबीसी वोट में सेंध लगाई साथ ही दलितों के साथ भोज, यात्राएं कर बसपा के वोट में सेंध लगाई। शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकटों के बंटवारे को लेकर थी। पार्टी ने किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं देकर ध्रुवीकरण को हवा दी और यह रणनीति बीजेपी के लिए गेमचेंजर साबित हुआ। इसके अलावा शाह ने जाति आधारित सभाओं में ब्राह्मण और दलितों को प्रमुखता दी गई। शाह की रणनीति गैर मुस्लिम जातियों को एकजुट करने की थी, और वह इसमें कामयाब रहे।

3) बीजेपी की स्ट्रटेजी- आखिरी दो चरण के मतदान जो कि 4 मार्च और 8 मार्च को हुए में पूर्वांचल की 89 सीटों पर मतदान हुआ और इस दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश प्रचार मुख्यालय को राज्य की राजधानी लखनऊ से हटाकर वाराणसी ले गए। वहीं पर आगे की रणनीति तैयार हुई किस तरह से विपक्ष को चारों खाने चित किया जाए। हालांकि शुरुआती चरणों के मतदान की बागडोर भी अमित शाह ने अपने कंधों पर ले रखी थी और चुनाव की सारी तैयारियों का नेतृत्व वे ख़ुद कर रहे थे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद शाह की रणनीति के मुताबिक ध्रुवीकरण के मसले को उछाला गया। इसके साथ ही अमित शाह ने प्रदेश में मौजूद संघ परिवार के संगठनों से बेहतर तालमेल बिठाते हुए रणनीति तैयार की, जिससे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों में पार्टी को बढ़त बनाने में मदद मिली।

4) नोटबंदी का निर्णय मोदी सरकार के पक्ष में रहा- जिस नोटबंदी के मुद्दे को विरोधियों ने मुद्दा बनाया उसी नोटबंदी का बीजेपी को फायदा मिला। सपा, बसपा और कांग्रेस ने इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की लेकिन नोटबंदी का मुद्दा आखिरकार बीजेपी के पक्ष में ही गया। यहां तक की नोटंबदी के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराते हुए उनकी नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश की गई लेकिन पीएम के लिए विधानसभा चुनाव में इसने टॉनिक का काम किया।

5) राज्यों में निकाय चुनावों के नतीजों से बना माहौल- ओडिशा पंचायत चुनाव महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त समर्थन मिला। ओडिशा में पहली बार जीत दर्ज की। 851 में से 306 सीटें जीतीं। महाराष्ट्र के 10 बड़े नगर निकायों की बात की जाए तो बीजेपी ने इनमें 8 नगर निकाय पर अपना कब्जा जमा लिया। बीएमसी चुनाव में इस बार बीजेपी ने 227 में से 82 सीटें जीतीं थीं। इस कामयाबी का असर यूपी में दिख रहा है।

6) सपा परिवार में झगड़े का फायदा- यूपी विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा। जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं सपा के थिंक टैंक प्रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए। इस विवाद में आजम खान जैसे सीनियर नेता हर समय दोनों खेमों के बीच सुलह का काम करते दिखे। आखिरकार चुनाव आयोग को तय करना पड़ा कि असली समाजवादी पार्टी कौन सी है और इसमें अखिलेश की जीत तो हुई लेकिन पार्टी के कैडर और जनता के बीच इसका गलत संदेश पहुंचा।

7) मायावती की सोशल इंजीनियरिंग फेल- बीजेपी अगर यूपी में सबसे आगे दिख रही है तो मायावती फैक्टर भी इसमें बड़ा कारण है। जिस दलित वोट को लेकर मायावती की पूरी राजनीति टिकी है बीजेपी उसमें सेंध लगाने में सफल रही। इस चुनाव में मायावती बिना किसी सोशल इजीनियरिंग के उतरीं थी। 2007 के चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण और दलित जातियों के गठजोड़ को साधा था और इस समीकरण को लेकर अपने बूते बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बात कहानी दोहराई नहीं जा सकी। बीजेपी ने दलितों को अपने पाले में करने के लिए भोज, यात्राएं जैसे कार्यक्रम रखे, जिसका बीजेपी को चुनावों में सीधा असर दिख रहा है।


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