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जानें, कौन है ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिनको लेकर पश्चिम बंगाल में मचा है उबाल

पश्चिम बंगाल में आखिरी दौर की वोटिंग से पहले ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति पर सियासी घमसान मचा है। बीते मंगलवार को कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा में कॉलेज परिसर में बनी ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (16 मई): पश्चिम बंगाल में आखिरी दौर की वोटिंग से पहले ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति पर सियासी घमसान मचा है। बीते मंगलवार को कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा में कॉलेज परिसर में बनी ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई। इस मामले में BJP और TMC एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। BJP का कहना है कि TMC के गुंडों और लोगों ने मूर्ति तोड़ी है वहीं दूसरी ओर TMC का कहना है कि BJP के लोगों ने ही ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी। प्रधानमंत्री मोदी ने ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधा है। उन्‍होंने कहा कि टीएमसी के गुंडों ने दादागिरी की और महान समाज सुधारक ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति को तोड़ दिया। पीएम मोदी ने ऐलान किया कि बीजेपी सरकार उसी जगह पर पंचधातु की एक भव्‍य मूर्ति बनवाएगी।  इन सबके बीच सवाल उठता है कि आखिर ईश्वरचंद विद्यासागर कौन हैं जिनपर पश्चिम में सियासी घमासान मचा है।ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक महान दार्शनिक, समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री, लेखक और स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे। उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने 'मेट्रोपोलिटन विद्यालय' सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना की और साल 1848 में वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का भी प्रकाशन किया था। नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद विद्यासागर का मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता है।ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के गरीब लेकिन धार्मिक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बन्धोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता। गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वह अपने पिता के साथ कोलकाता आ गए थे। वह चीजों को जल्दी सीख लिया करते थे। पढ़ाई में अच्छे होने की वजह से उन्हें कई संस्थानों से छात्रवृत्तियां मिली थीं। वह काफी विद्वान थे जिसके कारण उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई थी। साल 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी की। 21 साल की उम्र में साल 1841 में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया। यहां पांच साल तक अपनी सेवा देने के बाद उन्होंने इसे छोड़ दिया और संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के तौर पर नियुक्त हुए। पहले साल से ही उन्होंने शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए प्रशासन को अपनी सिफारिशें सौंपी। जिसके कारण उनके और तत्कालीन कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता के बीच तकरार पैदा हो गया। इस वजह से उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। 1849 में एक बार फिर वह साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुडे़।समाज सुधार योगदान के तहत ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना की। इन स्कूलों को चलाने का पूरा खर्चा उन्होंने अपने कंधों पर लिया। इसके लिए वह बंगाली में लिखी गई किताबों जिन्हें कि विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए लिखा जाता था, उसकी बिक्री से फंड जुटाते थे। जब उन्हें संस्कृत कालेज का प्रधानाचार्य बनाया गया तो उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिए। उनके लगातार प्रचार का नतीजा था कि विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ। उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी करवाई थी। उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी।


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