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इस बार भी लोकसभा बिना 'नेता प्रतिपक्ष' ही रहेगी !

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लोकसभा को इस बार भी नेता प्रतिपक्ष यानी एलओपी नहीं मिला। पिछली लोकसभा भी बिना एलओपी के ही चली थी। एलओपी होने की शर्त है कि लोकसभा सीटों की कम से कम 10 प्रतिशत सीट विपक्ष की किसी पार्टी के पास होनी चाहिए

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प्रभाकर मिश्रा, न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (30 मई): दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लोकसभा को इस बार भी नेता प्रतिपक्ष यानी एलओपी नहीं मिला। पिछली लोकसभा भी बिना एलओपी के ही चली थी। एलओपी होने की शर्त है कि लोकसभा सीटों की कम से कम 10 प्रतिशत सीट विपक्ष की किसी पार्टी के पास होनी चाहिए। चूंकि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 है ऐसे में नेता प्रतिपक्ष होने के लिए कम से कम 54 सीट की जरूरत होती है जो इस बार भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को नहीं मिल पाई है। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को मात्र 44 सीट ही मिल पायी थी जिसके चलते 'नेता प्रतिपक्ष' का पद नहीं मिल पाया था। हालांकि कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे को संसद में पार्टी का नेता चुना था लेकिन उनको 'नेता प्रतिपक्ष' का ओहदा नहीं मिल पाया था।

देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेता प्रतिपक्ष की अहम भूमिका होती है। लोकपाल, सीबीआई निदेशक और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति वाली कमिटि मेंनेता प्रतिपक्ष सदस्य होता है।  CVC एक्ट 2003 में यह व्यवस्था दी गयी है कि अगर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद खाली होगा तो उस स्थान पर लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को उस कमिटि में शामिल किया जा सकता है। पिछली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के अभाव में लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे लोकपाल, सीबीआई निदेशक और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए होने वाली बैठकों में भाग ले रहे थे।

2014 से पहले भी लोकसभा बिना नेता प्रतिपक्ष रही है:

ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही विपक्ष की किसी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष के लिए जरूरी सीटें नहीं मिल पायी हैं। इसके पहले भी लोकसभा बिना नेता प्रतिपक्ष के चली है। 1969 तक लोकसभा में कोई भी नेता प्रतिपक्ष नहीं रहा। 1979 से 1989 तक सातवीं और आठवीं लोकसभा भी बिना नेता प्रतिपक्ष के ही रही।

नेता प्रतिपक्ष बनने से जुड़ा नियम क्या है?देश के पहले लोकसभा अध्यक्ष जी वी मावलंकर के समय यह नियम बना कि नेता प्रतिपक्ष के लिए सदन में कम से कम 10 प्रतिशत सीटें होनी चाहिए। उसी समय से यह व्यवस्था चल रही है। इस नियम को 'मावलंकर नियम' भी कहा जाता है। 1977 में प्रतिपक्ष के नेता के वेतन - भत्ते को लेकर एक कानून बना। इस कानून में कहा गया है कि प्रतिपक्षी दलों में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोक सभाध्यक्ष मान्यता देंगे। उसे ही नेता, प्रतिपक्ष कहा जायेगा।

नेता प्रतिपक्ष की भूमिकानेता प्रतिपक्ष को संसदीय प्रणाली में पक्ष और विपक्ष को एक-दूसरे का पूरक कहा गया है। सत्तापक्ष की नीतियों की तर्कसंगत तरीके से आलोचना वगैरह के अलावा कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया में प्रतिपक्ष के नेता की मौजूदगी को संवैधानिक दृष्टि से अहम बताया गया है। मसलन, लोकपाल, सीबीआइ, आइबी या सीवीसीके निदेशक सीवीसी का चयन करने वाली कमेटी में प्रतिपक्ष के नेता को होना चाहिए। लोकसभा या राज्यसभा में विरोधी दल के नेता को वे सभी सुविधाएं मिलती हैं जो एक कैबिनेट मंत्री को देय है। संसद परिसर में कार्यालय के लिए कमरे, मानव संसाधन वगैरह सुविधाएं मिलती हैं।


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