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इंदिरा WAS इंडिया... मोदी IS इंडिया !

लोकसभा चुनाव के सारे नतीजे और रुझान आ चुके हैं। अब तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। मोदी की सुनामी पर सवार बीजेपी ने एक बार फिर ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए विरोधियों की बोलती बंद कर दी है। मोदी एक बार फिर महानायक बनकर सामने आए हैं

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (14 मई): लोकसभा चुनाव के सारे नतीजे और रुझान आ चुके हैं। अब तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। मोदी की सुनामी पर सवार बीजेपी ने एक बार फिर ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए विरोधियों की बोलती बंद कर दी है। मोदी एक बार फिर महानायक बनकर सामने आए हैं। इस जबर्दस्त जीत के साथ मोदी, पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद आजाद भारत के तीसरे ऐसे महानायक बन गए हैं जिन्होंने अपने बूते पार्टी को लगातार दो या उससे ज्यादा बार बहुमत के पार पहुंचाया है। इंदिरा गांधी की तरह ही नरेंद्र मोदी भी लार्जर दैन पार्टी बन गए हैं।

एक वक्त था जब देश की सियासत में इंदिरा का मतलब इंडिया और इंडिया का मतलब इंदिरा हो गया था। आपातकाल के दौरान 1975 में कांग्रेस अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने नारा दिया थाइंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंडिया। ये सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि उस वक्त इंदिरा गांधी की बेहिसाब ताकत की पहचान था। दरअसल ये वो वक्त था जब इंदिरा गांधी का कद पार्टी से भी बड़ी हो गया था कि उनकी कही हर बात पार्टी के लिए पत्थर की लकीर मानी जाती थी। उनकी कामयाबी पार्टी की कामयाबी मानी जाती थी। हालांकि आपातकाल के बाद गुस्से से भरे देश ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया पर बावजूद इसके उनका कद हमेशा पार्टी से बड़ा ही रहा।

करीब चार दशक बाद देश का इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है। नरेंद्र मोदी ने लगातार दूसरी बार बीजेपी को अकेले बहुमत का आंकड़ा पार करवाकर ये साबित कर दिया है कि उनका कद पार्टी से भी बड़ा हो चुका है। आपको वोट मोदी के नाम और आएगा तो मोदी ही जैसे नारों को तहे दिल से कबूल कर देश की जनता ने भी इस दावे पर मुहर लगा दी है कि उसके लिए मौजूदा राजनीति में मोदी से बड़ा और मोदी से ताकतवर नेता दूसरा कोई नहीं। बीजेपी में नरेंद्र मोदी का ये विशाल कद इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि इंदिरा गांधी की तरह ही मोदी ने भी पार्टी के कई दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए राजनीति में ये मुकाम हासिल किया है। अपने पिता पंडित नेहरू की छत्रछाया में जब इंदिरा गांधी ने राजनीति में कदम रखा तो उनकी सियासी समझ पर कई बार सवाल खड़े किए गए। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा ने तब पार्टी के मजबूत दावेदार मोरारजी देसाई को मात दी थी लेकिन 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस की सीटें कम हो गईं। इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस 8 राज्यों में कांग्रेस चुनाव हार गई तब राम मनोहर लोहिया ने इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहा था। लेकिन अपनी सूझ बूझ और इच्छा शक्ति से बहुत जल्द इंदिरा गांधी इस छवि से बाहर निकल गईं। पार्टी में टूट होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अगले आम चुनाव में अपने बूते पार्टी को भारी बहुमत दिलाकर खुद को आयरन लेडी साबित कर दिखाया।

इंदिरा गांधी की तरह ही नरेंद्र मोदी का शुरुआती सियासी सफर भी काफी मुश्किल रहा। तब भला कौन ये जानता था कि चाय बेचकर अपना गुजारा करने वाला एक शख्स एक दिन राजनीति के आसमान का सबसे चमकदार सितारा बन जाएगा। अस्सी के दशक में जब मोदी ने संघ से बीजेपी में कदम रखा तब पार्टी में उनके मुकाबले कई दिग्गज नेताओं की भरमार थी। 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा के आयोजन को सफल बनाने के बावजूद वो अगले दस सालों तक पार्टी में संगठन के लिए ही काम करते रहे। शंकर सिंह वाघेला जैसे पार्टी के दिग्गज नेताओं को पीछे छोड़कर वो सत्ता के करीब पहुंचे। फिर 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। अपनी सियासी समझ और रणनीतिक कौशल की बदौलत न सिर्फ लगातार 14 सालों तक गुजरात की हुकूमत संभाली बल्कि 2014 के चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी सरीखे सीनियर नेताओं को पीछे छोड़ते हुए पीएम कैंडिडेट बने और फिर इतिहास रच डाला। इंदिरा गांधी की तरह ही नरेंद्र मोदी ने भी सियासत में आने के बाद कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाए बल्कि इंदिरा गांधी को तो इमरजेंसी के बाद जनता की नकार का भी सामना करना पड़ा पर मोदी अब तक अपने सियासी सफर में अपराजेय हैं।


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