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पड़ोसियों को कर्ज के जाल में फंसा रहे चीन को इस तरह घेर रहा है भारत

नई दिल्ली (24 जुलाई): विश्व शक्ति बनने और अकेले एशिया का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा रखने वाला चीन अपने पड़ोसियों और दुनिया के अन्य विकासशील देशों को कर्ज का जाल में लगातार फंसाता जा रहा है। चीन की इस चाल को अब भारत अपनी नई रणनीति 'डॉलर डिप्‍लोमेसी' के तहत घेरने में जुटा है। भारत ने भी अब इस पर काम करना शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि चीन विभिन्‍न देशों को अपने समर्थन में लाने के लिए उन्‍हें कर्ज या आर्थिक मदद मुहैया करवाता आया है।

चीन अपनी विस्तारवादी योजना के तहत बांग्‍लादेश, श्रीलंका और पाकिस्‍तान को आर्थिक मदद करने में जुटा है। चीन ने श्रीलंका को आर्थिक मदद के साथ-साथ वहां पर इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर भी उपलब्‍ध करवाया है। ऐसा ही कुछ पाकिस्‍तान के साथ भी है, जहां पर CPICऔर ग्‍वादर पोर्ट निर्माण को लेकर चीन की दिलचस्‍पी जग-जाहिर है। पाकिस्‍तान उन देशों में शामिल है, जिस पर चीन जरूरत से ज्‍यादा मेहरबान होता दिखाई देता है। 

चीन के इस चाल का भारत ने भी तोड़ निकाल लिया है। भारत ने साल 2003 से लेकर 2014 तक अपने सहयोगी देशों को करीब 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि उपलब्‍ध करवाई थी, जोकि मौजूदा सरकार में बढ़कर करीब 24.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गई है। यहां पर ध्‍यान रखने वाली बात यह भी है कि जॉर्डन के सुल्‍तान और बेलारूस के राष्‍ट्रपति इस वर्ष भारत दौरे पर आने वाले हैं। मुमकिन है कि यह राशि और ज्‍यादा हो जाए।

भारत ने इस रणनीति पर चलते हुए रक्षा क्षेत्र में भी कुछ देशों को मदद देने की शुरुआत की है। इसके तहत वियतनाम और बांगलादेश से 500 मिलियन यूएस डॉलर, श्रीलंका और मॉरिशस से करीब 100 मिलियन यूएस डॉलर के रक्षा उपकरण के सौदे हुए हैं। इसके अलावा दक्षिण एशिया के कुछ अन्‍य देशों अफ्रीका और लेटिन अमेरिकी देशों से भी रक्षा उपकरणों को लेकर भारत से सौदा करने का प्रस्‍ताव मिला है। आने वाले कुछ वर्षों में भारत इस क्षेत्र में और आगे जा सकता है।

पिछले एक वर्ष के दौरान ही भारत ने करीब दस देशों में 925.94 मिलियन अमेरिकी डॉलर के 13 प्रोजेक्‍ट पर काम शुरू किया है। मौजूदा सरकार जिस विदेश नीति पर काम कर रही है, उसमें विभिन्‍न देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद के लिए ब्‍याज दर पूरी तरह से निर्धारित है। यह ब्‍याज दर वहां की प्रति-व्‍यक्ति आय और जीडीपी को देखते हुए रखी गई है। यह इंडियन डेवलेपमेंट एंड इकनॉमिक असिसटेंस स्‍कीम के तहत किया जाता है। इसकी गाइडलाइन को वर्ष 2015 में दोबारा तैयार किया गया है जो 2019-20 तक काम करेगी।


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