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कांग्रेस की संकटमोचक, इंदिरा-सोनिया के बाद सबसे मजबूत नेता थीं शीला दीक्षित

कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीली दीक्षित का शनिवार को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार थीं और उनका एस्कॉर्ट हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था

Sheila Dixit

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (21 जुलाई): कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीली दीक्षित का शनिवार को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार थीं और उनका एस्कॉर्ट हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था। वह साल 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। 

Sheila Dixit

शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च, 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ है। शीला दीक्षित ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से इतिहास में मास्टर डिग्री हासिल की. उनका विवाह उन्नाव (यूपी) के आईएएस अधिकारी स्वर्गीय विनोद दीक्षित से हुआ था। विनोद कांग्रेस के बड़े नेता और बंगाल के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय उमाशंकर दीक्षित के बेटे थे. शीलाजी एक बेटे और एक बेटी की मां हैं। उनके बेटे संदीप दीक्षित भी दिल्ली के सांसद हैं। दरअसल, मिरांडा हाउस से पढ़ाई के दौरान ही उनकी राजनीति में रुचि थी। 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में पहली बार शीला दीक्षित कन्नौज से लड़कर संसद तक पहुंची. गांधी परिवार की करीबी होने के नाते उन्हें राजीव गांधी के सरकार में संसदीय कार्य राज्यमंत्री और पीएमओ में मंत्री बनने का मौका मिला। 1998 में सोनिया गांधी के राजनीति में आने बाद शीला दीक्षित को भी दुबारा राजनीति में सक्रिय होने का मौका मिला। सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली की बांगडोर सौंपी. जिसके बाद शीला दीक्षित ने पलट कर नहीं देखा। केंद्र में चाहे बीजेपी की सरकार हो या कांग्रेस की लेकिन दिल्ली में शीला दीक्षित ही सत्ता में रहीं।

शीला दीक्षित ने अपने कार्यकाल में दिल्ली को एक नई पहचान दी। फ्लाईओवर से लेकर मेट्रो, दिल्ली की हरियाली, स्वास्थ्य और शिक्षा ऐसी कई पहल शीला दीक्षित ने की जिसको आज भी वो गर्व से गिनाती है। लेकिन शीला दीक्षित के दामन पर कॉमनवेल्थ गेम में हुए भ्रष्टाचार के आरोपों का दाग भी लगा, लेकिन ये शीला दीक्षित का व्यक्तित्व ही था जो वो हर आरोपों के सामने बहादुरी से खड़ी रही. वह 2014 में केरल की राज्यपाल भी रहीं। एक दौर ऐसा भी आया जब अपने तमाम उपलब्धियों के बावजूद शीला दीक्षित अन्ना आंदोलन और केजरीवाल के भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना नहीं कर पाई और सत्ता गंवा बैठी।

शीला दीक्षित अपनी काम की बदौलत कांग्रेस पार्टी में पैठ बनाती चली गईं। सोनिया गांधी के सामने भी शीला दीक्षित की एक अच्छी छवि बनी और यही वजह है कि राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें खासा महत्व दिया। साल 1998 में शीला दीक्षित दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गईं। 1998 में ही लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित कांग्रेस के टिकट पर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ीं, मगर जीतन नहीं पाईं। उसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ना छोड़ दिया और दिल्ली की गद्दी की ओर देखना शुरू कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि तीन-तीन बार मुख्यमंत्री भी रहीं।

ज्यादा जानकारी के लिए देखिए न्यूज 24 की ये रिपोर्ट...


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